शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

jubaan ki dhaar

                                                     "जुबान की  धार "




तेज धार
कैंची कि नहीं
जुबान की
छील देती है
काट देती है
कर देती है
तार -तार


घावो से रक्त
नहीं निकलता है
फिर भी हर घाव
अंदर से सड़ता है
बनता नासूर
पकता -फूटता
बार-बार


यह चुभते तीर
 मौलवी -पीर के
धागा बाँधने से
नहीं निकलते
घायल ताउम्र
तड़पता -रोता है
जार -जार

कोई विजयी नहीं होता
कोई शहीद नहीं होता
लेकिन मर जाता है
रिश्तो का प्यार
बढ़ जाती है
आपसी तकरार
चीर -फाड़

होता है अचरज
दो इंच की जुबान
तीर चला सकती है
युद्ध करा सकती है
इसके आगे है
हर कोशिश बेकार
हर -बार

vandana bajpai

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

AANKHYEIN

                                                             "  आँखे "


किस -किस को हम पढ़े 
किस -किस को हम बताये
हर आँख पर लिखी है
कई अलिखित कथाएँ


कुछ मुस्कुराती आँखे
हर बात बोले देती
 खिलखिलाती आँखे
हर राज खोल देती
छिपती है कब किसी से
दिल में भरी वफायें


बेचैन  आत्मा सी जो
इधर-उधर डोलती है
है टनो बोझ पलकों पर
जबरन  ही  खोलती है
छिपती है कब किसी से
 जीवन कि विडंबनाएँ

कुछ दर्द से भरी है
उदास सी खड़ी वो
रोके है दम लगा कर
आंसू कि फुलझड़ी को
छिपती है कब किसी से
मन में भरी व्यथाएँ

कुछ बाट जोहती सी
कुछ राह ताकती सी
लगती है बहुत प्यारी
ये दफ़न झुर्रियों में
छिपती है कब किसी से
बुजुर्गों की ये दुआएँ

VANDANA BAJPAI

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

umar

                                                           "    उम्र "



धीरे से
हर कविता कह देती है
कवि कि उम्र
फूल -पत्ती से शुरु कविता
पहुँचती है
प्रेम के पायदान पर
संयोग श्रँगार
वियोग श्रंगार
फिर घर-गृहस्थी
प्यार-तकरार
मानसिक द्वन्द
कुछ खोना
कुछ पाना
सामयिक समस्यायें
और अंत में
रह जाता है
सिर्फ
वैराग्य
vandana bajpai

kavi

                                                                    "कवि "



हाँ मैं कवि हूँ
पर मैं बहुत मुश्किल में हूँ

कितने दर्द छिपे है दिल में मेरे
पढ़ लती हूँ मैं अनाम चेहरे
हर दर्द बन जाता है दर्द मेरा
हर आँसू ने मेरा नेत्र घेरा

डूबती हूँ मैं भॅवर में
मैं ही साहिल भी हूँ

एकश्रृष्टि है बसी मेरे निलय में
जन्म लेते रोज़ मिटते ,प्रलय में
है गढ़ा उनको ये मैं जानती हूँ
पर कहा खुद से अलग मानती हूँ

संग चढ़ती डोलियों में
मैं जनाजों में शामिल भी हूँ


है नहीं आसान कविता को बनाना
पड़ता है खुद में ही डूब जाना
दर्द पढ़ने का मिला है आधिकार
आंसुओ में डूब कर मिला है प्यार

हूँ बहुत दूर सबसे
पर काव्य से हाँसिल भी हूँ

vandana bajpai

   

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

Kavita

                                                                      "कविता "



रखा है
मैंने तुम्हे
अपने मस्तिष्क के
गर्भ में
पोषित किया है
संचित
अनुभव से
धड़काया है
तुम्हारा ह्रदय
अपने मन के
कोमल भावो से
सजाया है
अश्रु बूंदो से
असह्य वेदना के साथ
जन्म दिया है
कलम के
मुख से
जननी हूँ
मैं तुम्हारी
और
तुम हो
मेरी कविता

वंदना बाजपेई 

uttardayetava

                                                                   "    उत्तरदायित्व "



समाज के 
हर क्षेत्र में होते है
उस क्षेत्र के ठेकेदार
जो अपने क्षेत्र में
जमने वाले
नव अंकुरों पर
इतनी जोर से करते है
आलोचना कि कुल्हाड़ी से वार
हो जाती है हत्या
किसी नव कोपल की
दफ़न हो जाते है
कुछ बीज अपने
सपनो कि मिटटी में
नहीं मिला पाते आँखे
कभी उगते सूरज से
क्या यह उत्तरदायित्व
नहीं है बड़ो का
कि फूट जाने दे कुछ कोपले
निकल आने दे
कुछ पत्तियाँ
मजबूत हो जाने दे
थोडा तना
फिर आजमायें
अपनी कुल्हाड़ी की धार

vandana bajpai

chota muh badi baat

                                                          "   छोटा मुँह बड़ी बात "



नदी या सागर
जिसे भी देता है
ईश्वर
गति या आकर
बोल-बोल कर
आठो पहर
करता ही रहता है
अपनी
श्रेष्ठता का गुणगान
और दीन -हीन तालाब
अपनी छोटेपन को
सम्भाले
रहता है शांत मौन
नहीं दिखाता  मान
जब डालता है कोई
कंकड़
थोड़ी देर को होती है
हलचल
जैसे कहना चाहता हो
कुछ अपने जज्बात
फिर हो जाता है मौन
अपनी क्षुद्रता के साथ
कौन सुनेगा ?
हँसेगे लोग
करेगे उपहास
"छोटा मुँह बड़ी बात "

vandana bajpai 

रविवार, 22 दिसंबर 2013

karegar

                                                                      "  कारीगर "      


मैं भी तो एक कारीगर हूँ
मैं कहा किसी से कमतर हूँ
तपते यथार्थ के धागो से
मैं ख्वाब  नया बुन लती हूँ

कितना भी पतझड़ फैला हो
गिरे पीले पत्तो का मेला हो
सूखे ठूठों में ढूंढ -ढूंढ  कर
मैं कुछ कलियाँ चुन लती हूँ

भीषण शोक कि वृष्टि में
आँसू से निमग्न सृष्टि मैं
घायल  सूखे होंठो पर  
मैं हँसने का गुण लती हूँ

नीरव निशब्द सी शांति में
मन दुविधा और भ्रांति मैं
निपट अकेलेपन में भी
मैं राग कोई सुन लती हूँ

हर हार मुझे करती विकल
पर उससे  ले नया सम्बल 
अपनी गलती से सीख-सीख
मैं राह नयी चुन लेती हूँ  

vandana bajpai                             

main aur mere kavita

                                                                        "मैं और कविता "



जब भी मैं कविता लिखती हूँ ,लिखती ही जाती हूँ
मन भावो के अनमोल दाम मैं  बिकती ही जाती हूँ



विस्मृत कितनी बीती बातें ,कहती  कुछ पुकार-पुकार
आँसू जो मैं पी थी चुकी आ जाते फिर  से खोल द्वार
चुन -चुन घावो को बीन-बीन मैं   सिलती ही जाती हूँ 


मुरझायें कितने कमल पड़े थे मेरे  भावो के सागर में
टूटी कितनी कच्ची कलियाँ थी  मेरे मन के उपवन में
हर शब्द-शब्द हर छंद -छंद मैं खिलती ही जाती हूँ


जानती हूँ एक दिन छूटेगी मेरी यह नशवर काया
ढूंढोगे तो भी मिल न सकेगी  मेरे मन कि छाया 
पर यह क्या कम है शब्दो में मैं ढलती ही जाती हूँ

vandana bajpai