गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

वंदना बाजपेयी कि कविता स्त्री ऋण

 



महंगे लिबासों में सजी-धजी

पितृसत्ता के छाते तले ‘स्वतंत्र’

हँसती मुसकुराती स्त्रियों

भूल मत जाना चुकाना ‘स्त्री ऋण’

तुम्हारे हिस्से आई इस स्वतंत्रता के लिए

किसी ने कुर्बान किया है अपना घर

कोई समाज से हुई है बहिष्कृत

किसी को धर्म ने किया है निष्काषित

औरतें यहाँ तक जा सकती हैं के भय ने

धीरे से बढाई हैं तुम्हारी देहरी की हदें

कि कम किया जा सके तुम्हारे विद्रोह की सीमा को

किसी के सूली पर चढ़ने पर ही  

मिली हैं तुम्हें रक्त से सनी स्वतंत्रता की रेवड़ियाँ

जिन्हें गटकते हुए

महंगे ब्यूटिपार्लर से

सेट कराए बालों की खुशबू में   

इतराते हुए मत उछाल देना गाली

“उफ़! ये आजादी का परचम लहराती औरतें!”

“कहाँ है गुलामी?”

“कब थी गुलामी?”

सुनो समाज ने तो तुम्हें

अपने माता-पिता का ऋण चुकाने

का अवसर भी नहीं दिया

तुम चुकाती रहीं अपने पति के मातृ-पितृऋण

पर स्त्रीऋण है तुमपर

और बढ़ रहा है सूद समेत

इसे चुका देना कम से कम

कृतघ्नता त्याग

किसी और स्त्री की राह आसान कर

वंदना बाजपेयी