शनिवार, 11 जनवरी 2014

baat man ki

                                                           "बात मन की "




क्या कह लेने से बँट  जायेगी
पीड़ा तेरे -मेरे मन की ?


एक युद्ध अनवरत चलता मन में
मन ही स्वामी मन ही सेवक
मन पिसता दो पक्षो के रन में
क्या निष्पक्ष होने से रूक जायेगी
  क्रीड़ा तेरे -मेरे मन की ? 


दुःख से जब जीवन घिर जाता है
मन -श्रष्टि नष्ट होने लगती है 
सागर आँखों में भर जाता है
क्या पीने भर से मुड़ जायेगी  
धारा तेरे -मेरे मन की ?

कितना भी कोई साथ चले 
पर मन के अंदर हम सब है
सदा ही नितांत निपट अकेले  
क्या संग चलने से थम जायेगी
लीला तेरे -मेरे मन की ?   

मनवांछित कुछ पा जाता है  
बस दो पल खुश रह पता है 
अगले पल  फिर ललचाता है
क्या सब पाने पर घट जायेगी
लिप्सा तेरे -मेरे मन की ?

vandana bajpai
(11.01.14)                     

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

avashesh

                                                            " अवशेष "
                                                            ................... 



देश के एक महानगर में
अति अभिजात्य इलाके में
 पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान
मैं ढूंढ रही हूँ
कुछ अवशेष

विवाह कि अनिवार्यता को
 अस्वीकारते युवा स्त्री-पुरूषों में
चूड़ी -सिन्दूर और महावर से
जनम-जन्मान्तर तक बंधने वाले
रिश्तों के अवशेष


अपनी स्वतंत्रता और  सुकुमारता
बनाये रखने कि अभिलाषा में
मातृत्व को नकारती युवतियों में
नारी को पूर्ण करने वाली
ममता का अवशेष

बात-बात पर झगड़ते
गाली-गलौज

अपशब्द अश्लील
भाषा का प्रयोग करते
तेज रफ़्तार गाड़ियों में दौड़ते
कमजोरों का स्वाभिमान रौंदते
इन नव  युवको में
 मानवता के अवशेष

अंत में मैं निष्कर्ष निकलती हूँ
माना नव निर्माण के लिए जरूरी है
पुरानी संरचना का ढ़हना
पर ध्यान रखा जाये
कम से कम
मिट्टी तो रहे शेष  ………

vandana bajpai
7.01.14