गुरुवार, 24 जुलाई 2014

                                              !!!!!!!!!!!!!!!!!!!अधूरी कहानी !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


समय नहीं है किसी के पास 
हम सब
सुबह से शाम तक 
घडी की सुइयों के मानिंद  
भाग रहे हैं 
पूरी करने को 
एक अधूरी कहानी
जो छूटेगी
कही न कहीं
किसी न किसी मोड़ पर
कि अरे!
सदा के लिए सो जाने से पहले
 यह तो कहना रह ही गया
अम्माँ से
कि अब  सुनाई नहीं देगी अल सुबह
 पिताजी की 
 बेंत  के लिए पुकार
कि मांगेगी नहीं बहन अब
रक्षा -बंधन की साड़ी
कि चल देगा अचानक बचपन का मित्र
जमी -जमाई बाज़ी छोड़ कर
कभी न खेलने के लिए
रह जायेगा देखना
कि जिस मकान के लिए
लगाई थी जीवन भर की पूँजी
कैसा लगेगा बनने के बाद
आह !
या खुदा
कैसा लेखक है तू
कि तेरी कोई कहानी
कभी मुकम्मल क्यों नहीं होती। …………………

सोमवार, 21 जुलाई 2014

                                                           !!!!!!!!!!!बेटी की माँ !!!!!!!!!!!!


अख़बार की सुर्ख़ियों से भयभीत मैं 
दिल पर पत्थर रख कर
अपनी मासूम बिटियाँ को समझा रही हूँ
स्त्री होने का अर्थ
रहना है हर पल सावधान सतर्क
की नरभक्षी हैं चरों तरफ
खीच रही हूँ स्वयं ही
उसके चारों ओर वर्जना की दीवारें
खड़े कर रही हूँ
अनेकों प्रतिबंधों के पहाड़
घूरती है बेटी
आँखों में हजारों प्रश्न लिए
मैं निरुत्तर सी प्रयत्न करती हूँ
दिखने का व्यस्त रसोई के कामों में
मुझे सुनाई  दे रहे है भयाक्रांत सी बेटी के
सुबकने के स्वर
भीग रही हूँ मैं ऊपर से नीचे तक
उसके गालों पर
लुढ़कते आंसुओं से
छूट रहे हैं मेरे हांथों से बर्तन
मेरे अदृश्य आंसू
मेरी मौन चीखें
एक ही बात कह रही हैं
अम्मा
आज समझी हूँ
जानी हूँ
तुम्हारी घबराई डबडबाई
आँखों का रहस्य
कितना कठिन  है
एक बेटी की माँ होना

                                         !!!!!!!!!!वाह ताज !!!!!!!!!!!


मैंने देखे  है वो घर 
जहाँ नक्काशी दार सोफों के ठीक बगल में
रखा है एक शो केस
जिसमें सजे हैं
खूबसूरत इटैलियन शो पीस
बालकनी में सजे हैं
कतारबद्ध महेंगे कैक्टस और
नायाब बोनसाई
रसोई घर अटा  पड़ा है
क्रिस्टल के बर्तनों से
कपड़ों की अलमारियां भरी हैं
हर विख्यात ब्रांड से
फिर क्यों?
 घुटन सी हैं वहां
फिर क्यों
कुछ कमी है वहां ………
जैसे कैद  हों कुछ साँसे
जैसे अनसुनी हो कुछ मौन चीखें
जैसे बांधें गए हो कुछ आँसू
हाँ शायद …
प्रतिष्ठा की दीवारों में
चुनवा दिए गए हैं
अरमान
पायलों के
अपने पैरों चलने के
डाली गयी है टनों मिट्टी
बिंदियाँ के
अपने प्रकाश से चमकने की इक्षा पर
दफन् हैं स्वप्न
घूंघट के
अपना आसमान छुने के
अजी ! मकबरा है जनाब
बेशक आप चिल्लाइये
वाह ताज                                      
वाह ताज !