" यह क्रोधियों क शहर है "
मैं लिखना चाहती हूँ
एक कविता भावनात्मक सी
पर कौन पढ़ेगा
क्योँकि यहाँ पढ़ी जाएँगी कवितायें
जो ललकारती है
दुत्कारती हैं
हैं क्रोध से भरी
क्योंकि यह क्रोधियों का शहर है
सुबह सात से दस क समय
बेतहाशा भरी बसों मे ,मैट्रो मे
एक दूसरे को कुचलते
भागते दौडते चलते हैं लोग
जल्दी से जल्दी काम पर जाना है
पैसा कमाना है
ऊँचा दिखने की होड़ मे
सुई से लेकर फ्लैट तक लिया है लोन मे
भयंकर आर्थिक दवाब मे
एक दूसरे पर चिल्ला रहे है
हाँ! यह क्रोधियों क शहर है
यह गाँव नही है यहाँ
दूध वाला ,सब्जी वाला ,यहाँ तक की कूड़े वाला
नहीं करना चाहता दो मिनट का इंतज़ार
उसका भी समय कीमती है ,
एक -एक मिनट की गिनती है
नहीं तो कैसे चुकेगा झुग्गी का किराया
और मिलेगा परिवार को पेट भर अनाज
इसलिए बिन बात झुंझलाता है ,बड़बड़ाता है
हां! यह क्रोधियों क शहर है
स्कूलों में तनाव से भरे छोटे -छोटे बच्चे
जिन्हे हर दिन खरा उतरना है
अपने को अपने माता -पिता की उम्मीद पर
जिससे ऊँची रहे उनके माता -पिता की नाक
हर सामजिक ,पारिवारिक समारोह मे
अर्थ जाने बिना देते हैअभद्र गालियाँ
लड़ते हैं खून निकलने की हद तक
बड़ों से सीखा है यही तनाव से निकलने के लिये
हाँ !क्रोधियों का शहर है
हर तरफ बात बात पर लड़ते -झगड़ते लोग
वजह बिना वजह चीखते -चिल्लाते लोग
यह शोर मेरे कानों में घुस रहा है
मेरा रक्त चाप बढ़ रहा है
सर झनझना रहा हैं
मुझे भी क्रोध आ रहा है
अब लिखूंगी कविता
वही समाज की मनोदशा बताएँगी
वही पढ़ी जाएगी
क्योंकि यह क्रोधियों का शहर है
मैं लिखना चाहती हूँ
एक कविता भावनात्मक सी
पर कौन पढ़ेगा
क्योँकि यहाँ पढ़ी जाएँगी कवितायें
जो ललकारती है
दुत्कारती हैं
हैं क्रोध से भरी
क्योंकि यह क्रोधियों का शहर है
सुबह सात से दस क समय
बेतहाशा भरी बसों मे ,मैट्रो मे
एक दूसरे को कुचलते
भागते दौडते चलते हैं लोग
जल्दी से जल्दी काम पर जाना है
पैसा कमाना है
ऊँचा दिखने की होड़ मे
सुई से लेकर फ्लैट तक लिया है लोन मे
भयंकर आर्थिक दवाब मे
एक दूसरे पर चिल्ला रहे है
हाँ! यह क्रोधियों क शहर है
यह गाँव नही है यहाँ
दूध वाला ,सब्जी वाला ,यहाँ तक की कूड़े वाला
नहीं करना चाहता दो मिनट का इंतज़ार
उसका भी समय कीमती है ,
एक -एक मिनट की गिनती है
नहीं तो कैसे चुकेगा झुग्गी का किराया
और मिलेगा परिवार को पेट भर अनाज
इसलिए बिन बात झुंझलाता है ,बड़बड़ाता है
हां! यह क्रोधियों क शहर है
स्कूलों में तनाव से भरे छोटे -छोटे बच्चे
जिन्हे हर दिन खरा उतरना है
अपने को अपने माता -पिता की उम्मीद पर
जिससे ऊँची रहे उनके माता -पिता की नाक
हर सामजिक ,पारिवारिक समारोह मे
अर्थ जाने बिना देते हैअभद्र गालियाँ
लड़ते हैं खून निकलने की हद तक
बड़ों से सीखा है यही तनाव से निकलने के लिये
हाँ !क्रोधियों का शहर है
हर तरफ बात बात पर लड़ते -झगड़ते लोग
वजह बिना वजह चीखते -चिल्लाते लोग
यह शोर मेरे कानों में घुस रहा है
मेरा रक्त चाप बढ़ रहा है
सर झनझना रहा हैं
मुझे भी क्रोध आ रहा है
अब लिखूंगी कविता
वही समाज की मनोदशा बताएँगी
वही पढ़ी जाएगी
क्योंकि यह क्रोधियों का शहर है