शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

!!!!!!!!!!!!!बस इतना ही !!!!!!!!!!!!!!!!


एक विशालकाय मैदान में
सुनने को आध्यात्मिक प्रवचन
जमा है भारी भीड़ 
जीवन से ऊबे हुए लोगों की
कोई ऊबा है अति सुख से
सब पा लिया
अब किसकी अभिलाषा ,किसकी इक्षा ?
कोई ऊबा है अति दुःख से
आखिर कहाँ जाये
हम ईश्वर के सताए ?
कोई पाना चाहता है मुक्ति
पर वैमस्यता से
कोई निज मन की दुर्बलता से
सब को छुआनी है
ज्ञान की चिंगारी
जग जाए पुन:जीवन की ललक
कुछ तो विस्तार हो
दर्शन का ...........
वहीँ मैदान में खेल रहे हैं
माता -पिता के साथ
अकेले घर में न छोड़ पाने की विवशता में
जबरन लाये गये बच्चे
जो मित्रवत
व्यस्त हैं खेलने में
छुआ -छुआई ,लंगड़ी -टांग
परे जाति -धर्म ,अमीर -गरीब की दीवारों के
तभी गुरु का प्रवेश
कुछ जानने की उत्सुकता
श श श ,चुप -चुप
समवेत स्वर
इन बच्चों को हटाओ
ये क्या जाने जीवन की दुरुहता
इनका उल्लासमय शोर
कहीं कम न कर दे
हामारा आज का ज्ञान का ग्राह्य अंश
मौन रहने के संकेतों के साथ
खदेड़े गए बच्चे
भीड़ पर दृष्टि दौडाते
मुस्कुराते गुरू
सिखाते हैं आज का पाठ
जीवन का मूल मन्त्र
तन की उम्र जो भी हो
मन से इन
बच्चों जैसा ही निश्छल बन जाना है

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

****खिलौना ***
धीरे से आना इस घर में
नन्हा सा शिशु यहाँ पर है
जो खेल रहा है खिलौने से


पहला खिलौना अहंकार
बेहद कोमल -नाजुक अपार
टूटे जो खुद ही बार -बार
पिघले न किसी के रोने से

दूजा खिलौना क्रोध प्रबल
सौ हाथियों का इसमें बल
चाबी बस जरा घुमा भर दो
हो जाये खड़ा बिछौने से

तीसरा खिलौना कामनाएं
अतृप्त अपूरित वासनाएं
दौड़े खुद कीचड में रपटे
ये दाग मिटे न धोने से

चौथा खिलौना मोह -माया
पिंजड़े से लगती है काया
जितना घुसे उतना फंसे
डरता है सभी के खोने से

पांचवां खिलौना अभीप्सा
लालच ,लोभ ,धन की की इक्षा
जोड़े जीवन भर तन काट -काट
ले जाये न कुछ भी दोने से

मन खेल रहा है खिलौने से
मन खेल रहा है खिलौने से

वंदना बाजपेयी