शुक्रवार, 15 मई 2015

जलजला

जलजला 


हे नाटककार !
कितना वीभत्स है
तुम्हारा दृश्य परिवर्तन
कि एक पूरा जीवंत नगर
भागती दौड़ती सड़के 
खिलखिलाते बच्चे
रूठते -मनाते
हंसों को जोड़े
कलरव करते फूल ,पशु, पक्षी
पलक झपकते ही
सम्मलित हो गए खंडहरों में
और
ऊँची ईमारतों के
भग्न अवशेषों के मध्य
जीवन स्वयं माँगने लगा
अपने होने का प्रमाण
वंदना बाजपेई

माय च्वाइस

माय च्वाइस


अब दरवाजे के बाहर
खाट डाल कर बैठी बुजुर्ग औरतें 
गर्भवती बहू को देखकर 
नहीं लगाती हैं अनुमान 
कौन सा पैर पहले उठा
दायाँ या बायाँ
नहीं पूछती हैं प्रश्न
खाने में क्या अच्छा लगता है
मीठा या नमकीन
सीधे सुनाया जाता है फरमान
अस्पताल जाने का
की पहले ही हो जाए
दूध का दूध ,पानी का पानी
मुस्कुराती बहुएं
मानती हैं आदेश शत -प्रतिशत
की जन्म से पहले ही क्यों न तय कर लिया जाए
किसे लेना है
ममता के घेरे में
मातृत्व हो गया है आरक्षित
ख़ास लिंग के लिए
क्या कहा जाए इसे
विज्ञान का वरदान
ममता का चयन
दो पीढ़ियों की एकता
या वो जो आजकल कहा जा रहा है
माय च्वाइस
वंदना बाजपेई

ऐलान

ऐलान
युग बीते
सदियाँ आई -गयी
पर मैं ,मैं ही रही 
जो कभी
युग पुरुष केइंतज़ार में
पत्थर बन तिल -तिल कर मरती रही
कभी निष्काषित किये जाने के विरोध में
धरती में घुसकर
वरण करती रही मृत्यु का
और कभी भरी सभा में चीरहरण पर
जलती रही धू धू कर
अपमान की चिता में
पर अब ..बस !
इसे विनम्र निवेदन समझो ,चेतावनी
या ऐलान
कि
छीन लिया है मैंने तुमसे प्राण दंड देने का अधिकार
अब बार -बार मरने से पहले
अपने सम्पूर्ण इक्षाओ ,स्वप्नों
और अस्तित्व के साथ
एक बार
जीना चाहती हूँ मैं
वंदना बाजपेई