ऐलान
युग बीते
सदियाँ आई -गयी
पर मैं ,मैं ही रही
जो कभी
युग पुरुष केइंतज़ार में
पत्थर बन तिल -तिल कर मरती रही
कभी निष्काषित किये जाने के विरोध में
धरती में घुसकर
वरण करती रही मृत्यु का
और कभी भरी सभा में चीरहरण पर
जलती रही धू धू कर
अपमान की चिता में
पर अब ..बस !
इसे विनम्र निवेदन समझो ,चेतावनी
या ऐलान
कि
छीन लिया है मैंने तुमसे प्राण दंड देने का अधिकार
अब बार -बार मरने से पहले
अपने सम्पूर्ण इक्षाओ ,स्वप्नों
और अस्तित्व के साथ
एक बार
जीना चाहती हूँ मैं
सदियाँ आई -गयी
पर मैं ,मैं ही रही
जो कभी
युग पुरुष केइंतज़ार में
पत्थर बन तिल -तिल कर मरती रही
कभी निष्काषित किये जाने के विरोध में
धरती में घुसकर
वरण करती रही मृत्यु का
और कभी भरी सभा में चीरहरण पर
जलती रही धू धू कर
अपमान की चिता में
पर अब ..बस !
इसे विनम्र निवेदन समझो ,चेतावनी
या ऐलान
कि
छीन लिया है मैंने तुमसे प्राण दंड देने का अधिकार
अब बार -बार मरने से पहले
अपने सम्पूर्ण इक्षाओ ,स्वप्नों
और अस्तित्व के साथ
एक बार
जीना चाहती हूँ मैं
वंदना बाजपेई
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें