गुरुवार, 16 जनवरी 2014

ak vichar

                                                          "एक विचार "




सभी है यहाँ  मेरे अपने नहीं कोई पराया
फिर जिंदगी में क्यों शिकवा हो किसी से

भरा है जिससे ये दिल नहीं दर्द सिर्फ मेरा
जो झरते आँख से हैं वो आँसू है सभी के

वंदना बाजपेई
16.01.14

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

                                                          "खोज "



मैं लिख रही हूँ 
कवितायेँ 
या ये कवितायेँ
मुझे
लिख रही हैं
क्या यह हैं
सिर्फ मेरी व्यथाएं
दर्द ,टीस ,चुभन
या समाज के
लिखित -अलिखित
दस्तावेज
या मेरा
मनोविज्ञान
दृष्टिकोण
या मात्र
एक खोज
उस सर्वशक्तिमान
अपराजित
अपरिभाषित
आभासी या वास्तविक
रहस्यमय तत्व की
जिसे
कहते है
मन
समग्र मन

वंदना बाजपेई

antar

                                                        "अंतर "



पत्थर ही तो थे
वो दोनों
जिनके
जरा सा
रगड़ते ही
निकलने लगती थी
चिनगारियां
लग जाती थी आग
झुलसते बच्चे
जल जाता नगर
अगर दिल होते तो
हर घर्षण
के बाद
बढ़ता स्पंदन
जिससे
बढ़ जाती रक्त -गति
और खीचने लगते
प्राण -वायु
जिसमे बह जाते
सब विरोध
अंतर
गलतफहमियाँ
मिलती ऊर्जा
पुनः
खिल जाता नगर

वंदना बाजपेई 

prerna

                                                        "प्रेरणा "



अक्सर सोंचती हूँ
हम सब के
अंदर
छिपे  है
एक हनुमान
अपनी
प्रतिभा
अपने बल से
सर्वथा अंजान
जिसे चाहिए
बस एक
जामवंत
जो याद दिला दे
 शक्ति
बढ़ा दे
हिम्मत
दे -दे
हौसला
करे विश्वास
और तब
असीम उत्साह से
 हर कोई
कर जायेगा पार
मार्ग की
बाधाएं अपार

वंदना बाजपेई

lipstik

                                                        "लिपस्टिक "


मुझे लिपिस्टिक लगाना पसंद नहीं है। जब तक खास जरूरत न हो मैं इससे दूर ही रहती हूँ।,और "किट्टी पार्टी "आदी  के लिए तो मेरे पास बिलकुल भी समय नहीं रहता है। पर उस दिन पड़ोस वाली सुलेखा जी पीछे ही पड़ गयी .......शांता जी के यहाँ "किट्टी पार्टी " है ,तुम्हे चलना ही पड़ेगा ………  और हां लिपस्टिक जरूर लगा लेना। दरसल उनके अनुसार मुझ जैसे अनाडी को कुछ "सामाजिक शिष्टाचार "सिखाना बहुत जरूरी था। मैं श्रृंगार मेज के सामने कुछ देर तक लिपस्टिक लिए खड़ी रही ,लगाऊँ  या न लगाऊँ की कश्मकश  में मेरे सरल मन ने सुन्दर दिखने की चाह  के ऊपर विजय पायी।
                                                       शांता जी के यहाँ एक बड़े से कमरे में बहुत सी  महिलायें बैठी थी। अति उत्साह के कारण  सुलेखा जी ने दरवाजे से ही मेरा सबसे परिचय करना शरू कर दिया। वो देखो … सबसे डार्क पर्पल लिपस्टिक लगाये हुए है …… वही जो सबसे तेज हँस रही है ,श्रीमती देसाई है उनके अपने ही सगे भाई ने प्रॉपर्टी के चक्कर में इनके पति कि हत्या कर दी थी। और वो जो टूनी रेड लिपस्टिक लगाये है……श्रीमती आहूजा हैं  ....... उनका पति इनके साथ नहीं रहता बंगलोर में रहता है किसी और के साथ। वो ब्राउन लिपस्टिक लगाये हैं……श्रीमती मिश्रा ,इनका बेटा तो जब तब इन पर हाथ उठा देता हैं। वो कॉफ़ी लिपस्टिक .......वो मेजेंटा.......  वो पिंक …… सुलेखा जी बताती जा रही थी।
                                                    मुझे पसीना आने लगा।  मैं हर चेहरे को गौर से देख रही थी। अचानक मुझे लगने लगा।हंसती -मुस्कुराती दिखती  इन महिलायों ने अपने होंठों पर लिपस्टिक नहीं लगा रखी है बल्कि पहरेदार बिठा रखे है जो रोक देते है रिसने से उनके दर्द और कसक को,और बनी रहती है उनके पिता की ,पति की ,भाई की ,बेटों की ,और घर की झूठी शान……… 

वंदना बाजपेई  

सोमवार, 13 जनवरी 2014

                                                  "स्वागत है ऋतुराज "


आगमन हो रहा है
वसंत का
कर लिया है
प्रकृति ने श्रृगार
आरंभ हो गया है
मदन -रति का
नृत्य
मैंने भी
 निकाल लिए है
कुछ सूखे
लाल गुलाब
जो तुम्हारे
स्पर्श से
पुनः खिल जायेगे
वो पुरानी बिंदिया
जो तुम्हारी
दृष्टि पड़ते ही
सुनहरी हो जायेगी
और सिल ली है
वो पायल
जिसकी
छन -छन
सीधे तुम्हारे
ह्रदय में जायेगी
हर वसंत
की तरह
इस बार भी
पुनः और दृढ
हो जायेगा
हमारे रिश्ते का वृक्ष
जिसे वर्ष भर
असंख्य जिम्मेदारियों
और व्यस्तताओ के बीच
धीरे -धीरे ,चुपके -चुपके
सींच रहे थे
हम -तुम
"स्वागत है ऋतुराज"

वंदना बाजपेई
13.01.14














                                                               "वसंत ऋतु "




फिर पद चाप
 सुनाई पड़ रहे
 वसंत ऋतु के आगमन के
 जब वसुंधरा
बदलेगी स्वेत साडी
करेगी श्रृंगार
उल्लसित वातावरण में
झूमने लगेंगे
मदन -रति
और अखिल विश्व
करने लगेगा
मादक नृत्य
सजने लगेंगे
बाजार
अस्तित्व में
आयेगे
अदृश्य तराजू
जो फिर से
तोलने लगेंगे
प्रेम जैसे
विराट शब्द को
उपहारों में
अधिकार भाव में
आकर्षण में
भोग -विलास में
और विश्व रहेगा
अतृप्त का अतृप्त
फिर सिसकेगी
प्रेम की
असली परिभाषा
क्योकि
जिसने उसे जान लिया
उसके लिए
हर मौसम
वसंत का है
जिसने नहीं जाना
उसके लिए
चार दिन के
वसंत में भी क्या है ?

वंदना बाजपेई
13.01.14





रविवार, 12 जनवरी 2014

khushi

                                                                          ख़ुशी 


खुश रहती हूँ मैं
क्योंकि
नहीं करती
हर माह की
उनंतीस रातें
ख़राब
सिर्फ और सिर्फ
पूर्ण चन्द्र देखने की
ख्वाहिश में
इसीलिए
जीवन की
हर कुरूपता
असामानता
और
अपूर्णता में
ढूंढ लेती हूँ
ख़ुशी के
कुछ कतरे।

-Vandana Bajpai




मेरा इस शहर में नया -नया तबादला हुआ था ।  जिससे दोस्ती करता सब दीनानाथ जी के बारे में कुछ न कुछ बताते । दीनानाथ जी हमारे ही दफ्तर के दूसरे विभाग में काम करते थे ।  वे क्लर्क थे , पर हर कोई उनकी तारीफ    करता था ........ क्या आदमी हैं ......... कहाँ -कहाँ तक उनकी पहुँच है , हर विभाग के अफसर के घर चाय -पानी है ।

एक दिन एक मित्र ने मुझसे यहाँ तक कह दिया कि अगर कोई काम अटके तो दीनानाथ जी से मिल लेना ,चुटकियों में काम हो जाएगा । पर मैंने सोचा मुझे क्या करना है ?  दो  रोटी खानी हैं और अपनी फकीरी में मस्त ! बच्चों  के साथ खेलूं या दीनानाथ से मिलूँ ।

पर विधि का विधान , मेरी एक फाइल फंस ही गई । मैं लोगों के कहने पर उनके घर गया । दीनानाथ जी सोफे पर लेटे  थे । स्थूलकाय शरीर, तोंद कमीज की बटन तोड़ कर बाहर आने की कोशिश कर रही थी । पान से सने दांत और बड़ी -बड़ी मूंछें जो उनके व्यक्तित्व को और भी रौबीला बना रही थीं  । मैंने जाकर पाँव छुए (सबने पहले ही बता दिया था कि उन्हें पाँव छुआना  पसंद है ), वे उठ बैठे ।

मैंने अपनी समस्या बताई। " बस इतनी सी बात " वे हंस पड़े ,ये तो मेरी आँख की पुतली के इशारे से हो जाएगा । उन्होंने कहा '' अब क्या बताएं मिश्राजी ,यहाँ का पत्ता-पत्ता मेरा परिचित है ।सब मेरे इशारे पर काम करते हैं !

उन्होंने अपने परिचय सुनाने शुरू किये ,फलाना अफसर बुआ का बेटा ,वो जीएम् ...  उसकी पोस्टिंग तो मैंने कराइ है । दरअसल उसका अफसर मेरे साले के बहनोई का पडोसी है ।

मैं सुनता जा रहा था ,वो बोलते जा रहे थे । कोई लंगोटिया यार ,कोई कॉलेज का मित्र कोई रिश्तेदार ,और नहीं तो कोई मित्र के मित्र का पहचान वाला । मैं चमत्कृत था, इतना  पावरफुल आदमी !! मुझे तो जैसे देव पुरुष मिल गए ! मेरा काम तो हुआ पक्का !! 

मैं उनके साथ साहब से मिलने चल पड़ा । साथ में चल रहे थे उनके पहचान के किस्से !वो बताते जा रहे थे और साथ में जगह -जगह पर पान की पीक थूक रहे थे । मुझे उन्हें थूकते हुए देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई बड़ा अधिकारी किसी फाइल पर अपनी मोहर लगा रहा हो । सारा रास्ता उनकी मोहरों से रंग गया ।मैं मन ही मन सोच रहा था कि कितने त्यागी पुरुष हैं, इतनी पहचान होने पर भी साधारण जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।इन्हे तो संसद में होना चाहिए !!

सर्दी के दिन थे । सामने चाय की छोटी सी रेहड़ी थी ।मैने चाय पीने की इक्छा  ज़ाहिर की । वे अनमने से हो गए । पर मैं क्या करता ? उंगलियाँ अकड़ी जा रही थीं । इसलिए उनसे क्षमा -याचना करते हुए एक चाय का आर्डर दे दिया ।  दीनानाथ जी मुंह फेर कर खड़े हो गए।

वृद्ध चाय वाले ने मुझे चाय दी । मैंने चाय पीते हुए दीनानाथ जी को आवाज दी ।

बूढा चाय वाला बोला- उसे मत बुलाओ ,वो नहीं आएगा ।वो मेरा बेटा  है । वो अब बड़ी पहचान वाला हो गया है । अब अपने बूढे बाप को भी नहीं पहचानता । 

चाय मेरे गले में अटक गई ।दूसरों से पहचान बढ़ाने के चक्कर में अपनी पहचान से इनकार करने वाले दीनानाथ जी अचानक मुझे बहुत छोटे लगने लगे ।
vandana bajpai