मंगलवार, 14 जनवरी 2014

antar

                                                        "अंतर "



पत्थर ही तो थे
वो दोनों
जिनके
जरा सा
रगड़ते ही
निकलने लगती थी
चिनगारियां
लग जाती थी आग
झुलसते बच्चे
जल जाता नगर
अगर दिल होते तो
हर घर्षण
के बाद
बढ़ता स्पंदन
जिससे
बढ़ जाती रक्त -गति
और खीचने लगते
प्राण -वायु
जिसमे बह जाते
सब विरोध
अंतर
गलतफहमियाँ
मिलती ऊर्जा
पुनः
खिल जाता नगर

वंदना बाजपेई 

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