रविवार, 19 जुलाई 2015

बैसाखियाँ






बैसाखियाँ 

जब
जीवन के पथ पर
 गर्म रेत सी 
लगने लगती   दहकती  जमीन
जब बर्दाश्त के बाहर हो जाते  है
दर्द भरी लू  के थपेड़े
संभव नहीं दिखता
 एक पग भी आगे बढ़ना
और रेंगना
बिलकुल असंभव
तब ढूढता है मन बैसाखियाँ


२ )
ठीक उसी समय
बैसाखियाँ ढूंढ रही होती हैं लाचार 
लाचारों  के बिना खतरे में होता है उनका वजूद
आ जाती हैं देने सहारा
गड जाती हैं बाजुओं में
एक टीभ सी उठती है
सीने के बीचो -बीच
विवशता है
सहनी ही है यह गडन
 लाचारी  ,और बेबसी से भरी नम आँखें
बहुधा नजरंदाज करती हैं बैसाखियाँ






३ )
मानता है अपंग
लौटा नहीं जा सकता अतीत में
न मांग कर लाये जा सकते हैं
दबे कुचले  पाँव
जीवन है तो चलना है
गर
जारी रखनी है यात्रा
आगे की तरफ
तो जरूरी है लेना
बैसाखियों का सहारा

४ )
बैसाखियाँ कभी हौसला नहीं देती
वो  देती है सहारा
कराती हैं अहसास
अपाहिज होने का
जब
आदत सी बन जाती हैं बैसाखियाँ
तब मुस्कुराती हैं अपने वजूद पर
कि कभी -कभी भाता  है उनको
देखना
गिरना -पड़ना और रेंगना
की बढ़ जाता है
उनका कुछ कद
साथ ही बढ़ जाती है
लाचार के बाजुओ की गडन




५ )
बैसाखियाँ
प्रतीक हैं अपंगता की
बैसाखियाँ 
प्रतीक हैं अहंकार की
बैसाखियाँ
प्रतीक हैं शोषण की
फिर भी आज हर मोड़ पर मिल जाती हैं बैसाखियाँ
बिना किसी रंग भेद के
बिना किसी लिंग भेद के
देने को सहारा
या एक दर्द भरी गडन
जो रह ही जाती है ताउम्र

६ )
बैसाखियाँ सदा से थी ,है और रहेंगी
जब -जब
भावुक लोग
महसूस करेगे
अपने पांवों को कुचला हुआ
तब -तब वजूद में आयेगी  बैसाखियाँ
इतरायेंगी  बैसाखियाँ
सहारा देकर
स्वाभिमान छीन  ले जायेंगी बैसाखियाँ 
जब तक
भावनाओं  के दंगल में
हारा ,पंगु हुआ पथिक
अपने आँसू
खुद पोछना
नहीं सीख जाएगा
तब तक बैसाखियों का कारोबार
यूँ ही फलता -फूलता जाएगा

वंदना बाजपेई

बोनसाई





बोनसाई
हां !
वही बीज तो था
मेरे अन्दर भी
जो हल्दिया काकी ने
बोया था गाँव की कच्ची जमीन पर
बम्बा के पास
पगडंडियों के किनारे
जिसकी जड़े
गहरी धंसती गयी थी कच्ची मिटटी में
खींच ही लायी थी
तलैया से जीवन जल
मिटटी वैसे भी कहाँ रोकती है किसी का रास्ता
कलेजा छील  के उठाती है भार
तभी तो देखो क्या कद निकला है
हवाओ के साथ
झूमती हैं डालियाँ
कभी फगवा कभी सावन गाते
कितने पक्षियों ने बना रखे हैं घोंसले
और सावन पर झूलो की ऊँची –ऊँची पींगे
हरे कांच की चूड़ियों
संग जुगल बंदी करती
बाँध देती हैं एक अलग ही समां
और मैं ...
शहर में
बन गयी हूँ बोनसाई
समेटे हुए हूँ अपनी जड़े
कॉन्क्रीट कभी रास्ता जो नहीं देता
और पानी है ही कहाँ ?
तभी तो ऊँची –ऊँची ईमारते
निर्ममता से  
रोक लेती है
किसी के हिस्से की मुट्ठी भर धूप
पर दुःख कैसा ?
शहरों में केवल बाजार ही बड़े हैं
अपनी जड़े फैलाए 
खड़े हैं चारों तरफ
अपनी विराटता पर इठलाते 
अट्हास करते 
बाकी सब कुछ बोनसाई ही है
बोनसाई से घर
घरों में बोनसाई सी बालकनी
रसोई के डब्बो में राशन की बोनसाई
बटुए में नोटों की बोनसाई
रिश्ते –नातों में प्रेम की बोनसाई
और दिलो में बोनसाई सी जगह
इन तमाम बोंनसाइयों के मध्य
मैं भी एक बोनसाई
यह शहर नहीं
बस  बोंनसाइयों का जंगल  है
जो आठो पहर
अपने को बरगद सिद्ध करने पर तुले हैं

वंदना बाजपेई 

बेचारा मनुष्य








बेचारा मनुष्य 


तर्क जब थाम लेता है शब्दों की तलवार 
और नेस्तनाबूत कर देना चाहता है 
हर विकल्प 
तो डर कर कहीं मृग छौने
सा छिप जाता है प्रेम 
नहीं समझाया जा सकता
तब
शबरी के झूठे बेरों का भाव
कन्हैया की बांसुरी की धुन पर
काम-काज छोड़
भागती गोपियों का उल्लास
मीरा की दीवानगी
तब
विदुर द्वारा दिए गए
केले के छिलकों में
नजर आती है कूटनीति
और ईश्वर का अस्तित्व
वो भी तो
पड जाता है खतरे में
तब मन की
कच्ची जमीन पर
फूटता है
एक प्रश्न का अंकुर
की बुद्धि और ह्रदय के
दो ध्रुवों के मध्य
पल -पल संतुलन साधता मनुष्य
सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ प्राणी है
या सबसे
बेचारा प्राणी है