होता ही नहीं ख़त्म सफ़र मेरी नाव का
ना जाने मुझसे रूठकर किनारे कहाँ गए।
आँखों का तारा कहा कभी बुढ़ापे की लाठी
ना जाने मेरे दिल के वो सहारे कहाँ गए।
रोशन थी जिससे रात की तन्हाइयाँ मेरी
ना जाने आसमान से वो सितारे कहाँ गए।
चहकते थे हम कभी जिनको देखकर
ना जाने वो खुशगवार नज़ारे कहाँ गए।
रास्ता दिखाते थे जो हमें हर मोड़ पर
ना जाने वो उँगलियों के इशारे कहाँ गए।
रूह काँपती थी सभी की जिनके खौफ से
ना जाने कफ़न ओढ़ कर वो बेचारे कहाँ गए।
जो थे मेरे दर्द और तकलीफ के साथी
ना जाने वक्त के साथ वो प्यारे कहाँ गए
वंदना बाजपेई