शनिवार, 4 जनवरी 2014

bhaavuk

                                                                "भावुक "




बचपन में
जब घर के बड़े
कुछ पढ़कर -देखकर
अचानक आँखे भर लेते
सोचती थी
कहाँ से लाते है
इतने आँसू
कहाँ है
इनकी टंकियाँ
जैसे-जैसे
मैं खुद बड़ी
होती गयी
दिल में कई
दर्द इकट्ठे
करती गयी
जिन्हे सब से
छुपाकर
रख लती हूँ
मन की
सात परतों में
दबाकर
जो अचानक कुछ
व्यथा -कथा
देख
निकल आते है 
मैं झट
आंसू पोछ
मुकुरातीहूँ
मैं तो बस
भावुक हूँ …

vandana bajpai

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

ath shri ghughat katha

                                                      अथ श्री घूँघट कथा 

                                              

यादो के पन्ने पलटती हूँ। जब मेरी नयी -नयी शादी हुई थी। किसी पारिवारिक समारोह में हम सब नयी बहुए भारी -भारी साडी और जेवर पहने माथे के नीचे तक घूँघट किये लगभग एक जैसे ही दिख़ती थी। ऐसे में जब परिवार के पुरूष सदस्य हमारी महिला -मंडली में प्रवेश करते थे तो पहचान न पाने के कारनं वो अपनों से छोटो के भी पैर छू  जाते थे। हमें दिख रहा होता था ,पर मुँह से मना करे ,या हाथ पकड़ कर रोक दे……… न बाबा ना .........इतनी संस्कार हीनता कि हमें इजाजत नहीं थी। फिर क्या आओ ,पैर छुओ और बिना आशीर्वाद प्राप्त किये जाओ। उसके बाद हम लोग हँसते थे कि किस-किस जेठ ने किस-किस बहु के पैर छु लिए।
                                        समस्या तब आयी जब हमारी इस मासूम सी हंसी पर परिवार कि एक बुजुर्ग महिला की नजर पड़ गयी। आनन् -फानन में परिवार के धड़ाधड़ पैर छुआउ आशीर्वाद प्राप्त करने कि इक्षुक पुत्रो के हित में फरमान जारी हुआ कि इन नयी बहुओ के साथ परिवार की एक बुजुर्ग महिला जरूर रहेगी जो पुत्रो को उनके सम्मान की रक्षा हेतु सावधान करती रहेगी
                                                    लला ,इ का नहीं इ चुटकवा की है। उ का नहीं उ बबलू की है। ……। और उ का तो बिलकुल ही नाही उ तुम्हार दुल्हन है……… .

vandana bajpai
3.01.14

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

prayaas

                                                                     "प्रयास "



फिर शरू करनी है
एक नयी
 जददोजहद
पूस की धुंध में
सुखानी है
दुखो की चादर
जेठ की तपन में
ठंडा करना है
अपूर्ण स्वप्नो को
 खौलते मन में
बारिश की बूंदो में
अंनबहे आंसुओं को 
पी लेना है
गीली  आँखों से
हर साल की तरह
फिर इस बार
कर लेना है
समय का
पुल पार
सर पर लिए
अतीत की
गठरी का भार
vandana bajpai

रविवार, 29 दिसंबर 2013

NAYA SAAL

                                                            "नया साल "
                                                  HAPPY NEW YEAR


नया साल आने वाला है
सब खुश है
सबने तैयारी कर ली है
इस उम्मीद के साथ
शायद
जाग जाये सोया भाग्य


उसने भी
जिसने आपने फटे बस्ते में रखी
फटी किताब को
सिल लिया है
इस उम्मीद के साथ
शायद कर सके
काम के साथ विद्याभ्यास


उसने भी
जिसने असंख्य कीले लगी
चप्पल में फिर से
ठुकवा ली है नयी कील
इस उम्मीद के साथ
 शायद पहुँच जाए
चिर -प्रतिच्छित मंजिल के पास


उसने भी
जसने ठंडे पड़े चूल्हे
और गीली लकड़ियों को
पोंछ कर सुखा लिया है
इस उम्मीद के साथ
शायद इस बार
बुझ सके पेट की आग


और उन्होंने भी
जो बड़े-बड़े होटलों क्लबों  में
जायेगे पिता-प्रदत्त
बड़ी-बड़ी गाड़ियों में
सुन्दर बालाओं के साथ
नशे में धुत
चिंता -मुक्त
जोर से चिलायेगे
हैप्पी न्यू इयर
इस विश्वास के साथ
बदल जायेगी अगले साल
यह गाडी
और यह.......

VANDANA BAJPAI