शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

माँ का मौन 

बाबा
जब आप गुस्से में
डाँटते थे 
डरे -सहमें से हम बच्चे 
दुबक जाते थे 
घर के किसी कोने में 
अन्ताक्षरी खेल -खेल कर 
प्रतीक्षा करते थे
जब उतर जायेगा गुस्से का ज्वार
तब निकल आएगी हमारी सेना
पलंग के नीचे से
सोफे के पीछे
फिर से हुडदंग को तैयार
पर माँ .....
माँ नाराज़ होने पर कुछ नहीं कहती
बहुधा हो जाती थी मौन
माँ के मौन होते ही
मौन हो जाता आँगन
मौन हो जाता तुलसी का पौधा
मौन रसोई
मौन बर्तन
मौन गुड़ियां
मौन खिलौने
माँ का मौन पसर जाता हमारे अन्दर
भूल ही जाते हर शैतानी
खो जाते हम बच्चों के स्वर
तब महसूस होता था
सही कहती थी दादी
माँ से संतान की नार कभी कटती नहीं है 

सोमवार, 15 सितंबर 2014

मेहँदी 

दो अपरिचित लोगों के मध्य 
विवाह की 
पवित्र गाँठ 
जाने कहाँ से लाती है पत्तियाँ 
कूट -पीस कर जिन्हें 
उकेर देती है 
फूल -पत्ती 
बना देती है बेल कंगूरे 
मन की हंथेली पर
धीरे -धीरे
चढ़ जाता है
ऐसा रंग
प्रेम और विश्वास का
जो जन्म -जन्मांतर तक
उतरता ही नहीं 
           
रक्षा बंधन 


आज बाँधी है   प्रत्यक्ष  राखी
  रोज़ बांधती हूँ अप्रत्यक्ष राखी
वो धागे कभी दिखते नहीं हैं
वो बंधन कभी मिटते नहीं हैं

वो हर आँसू  जो तुम्हारी याद में बहाया
वो हर दर्द जो तुम्हारे दर्द पर उभर आया
मेरे मन का,  आत्मा का हर वो कोना
जिस पर रहा  तुम्हारा ख़याल छाया

कितने अदृश्य धागों से बंध गए हो तुम
मेरे आँसू  और हँसी दोनों में बसे  हो तुम

स्नेह  के यह   बंधन बस एक राखी तक कहाँ सिमट पाएंगे
भाई -बहन के  रिश्ते जन्म -जन्मान्तर तक चलते जायेंगे


















                                                        !!!!!!!!! शुक्रिया !!!!!!!!!!!




हे प्रिय 
तुम्हारे आगमन पर ही
मैंने भड़भड़ाकर
खोले थे किवाड़
बदहवास सी भागी थी
निकलकर
अपनी सुरक्षित खोल से
तुम्हारे आलिंगन के बाद ही
सीखा था
धारा के विपरीत चलना
परवाह नहीं रह गयी थी
मार्ग के काँटों की
 और लहूलुहान पैरों की
रक्त बीज सी बढ़ी थी
इक्षाशक्ति
ढूंढने को मुक्ति मार्ग
शुक्रिया दुःख
गर तुम न आते
तो मेरी जिंदगी की किताब में
सफलता के
यह सुनहरे अध्याय
कभी न लिखे जाते   
!!!!!!!!!!तट !!!!!!!!!!!!

सृष्टि के प्रथम दिवस ही 
जान गयी थी मैं 
कल -कल करते जल की तरह 
मनोभावों के तेज बहाव के साथ 
इत -उत बहाना 
प्रकृति है तुम्हारी 
इसीलिए तो
सही थी हर पीड़ा और 
बन गयी थी तट
माँ ,बहन ,पत्नी बेटी के रूप में
तब से अब तक
बांधती ही रही हूँ तुम्हे
मर्यादा की सीमा रेखाओं में
तभी तो लहरायी है यह फसलें
पर सुनो !
अब
इतना भी मत प्रबल करो वेग
की टूट ही जाऊ मैं
क्योकि अगर मैं टूटी
तो न मैं रहूंगी
न तुम
और
न यह सृष्टि 
!!!!!!!!!कसक !!!!!!!!!!!

अम्मा
हर सुबह 
कितने इत्मीनान से तुम चुनती थी 
एक -एक पुष्प 
गूँथती थी माला 
सजाती थी ठाकुरद्वारा 
गूंजते थे घर में 
तुम्हारे भजन के स्वर 
और हम एक
मधुर अहसास के साथ
आँख मिचमिचाते हुए
सबसे पहले
देखते थे
तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा
और मैं
हर सुबह
घडी की सुइयों के पीछे भागते हुए
ढूंढती हूँ
वही मंदिर की घंटियाँ
श्लोकों से स्वर
वो पूजा के फूल
वो इत्मीनान से भरी सुबह
और
भागती जिन्दगी के साथ भागने को तैयार
कुछ ऊँचा उठाने की तलाश में
उतर जाती हूँ घर की सीढियां !!!
एक कसक लिए ..........
वाह रे चित्रकार
एक कोना रंग देना और एक खाली छोड़ देना
तुम्हारे रंगने का
अंदाज़ ही निराला है 
!!!!!!!!!!भूकंप !!!!!!!!!!

अम्मा 
सही कहती थी तुम 
धरती सी होती है नारी
प्रेम दीवानी सी 
काटती रहती है सूर्य के चारों ओर चक्कर 
बिना रुके बिना थके 
और अपने अक्ष पर थोडा झुककर
नाचती ही रहती है दिन रात
कर्तव्य की धुरी पर
पूरे परिवार को
देने को हवा -पानी ,धूप
सह जाती है असंख्य पदचाप
दे कर अपना रक्त खिलाती है
फूल -फल
हां अम्मा !!!
सही कह रही हो तुम
पर .........
कभी तो विचलित होता होगा मन
चाहती होगी छण भर विश्राम
कुछ हिस्सेदारी सूरज की भी
किरने देने के अतिरिक्त
नियमों ,परम्परों से जरा सी मुक्ति
बांटना चाहती होगी जरा सा दर्द
जरा सी घुटन
भावनाओं का अतिरेक
हां शायद तभी ... तभी
हिल जाती है सूत भर
और दरक जाती है चट्टानें
बिखर जाते हैं .-, वन -उपवन ,नगर के नगर
क्या तभी आते हैं भूकंप ?
बताओ ना ...........
पर यह क्या अम्मा ?
मरे इस प्रतिप्रश्न पर तुम मौन
आँखों में समेटे
कुछ ........अलिखित सा
शायद !!!
तुम भी कर रही हो चेष्टा
कब से
रोकने की एक भूकंप
अन्दर ही अन्दर 
!!!!!!!!!फेस बुक पर महिलाएं !!!!!!!!!!!! 

जरा गौर से देखिये 
फेस बुक पर अपने विचारों की 
अभिव्यक्ति की तलाश में आई 
यह महिलाएं 
आप की ही माँ ,बहन बेटियाँ हैं 
जो थक गयी है 
खिडकियों से झांकते -झांकते 
देखना चाहती है 
दरवाज़ों के बाहर
देना चाहती है अपने पखों को
थोडा सा विस्तार
आँचल में समेटना चाहती है
थोडा सा आकाश
कोई हल्दी और तेल सने आँचल से
पोंछते हुए पसीना
चलाती है माउस
कोई घूंघट के नीचे से
थिरकाती है उंगलियाँ की बोर्ड पर
कोई जीवन के स्वर्णिम वर्ष
कर्तव्यों में होम कर
देना चाहती है कुछ अपने को पहचान
कहीं आप का यह असंयत व्यव्हार
यह नाहक वाद -प्रतिवाद
जबरन उठाई गयी उंगलियाँ
अभद्र मेसेज
बेवजह की चैटिंग
रोक न दे इनकी परवाज़
रोक दी जाये एक बहू
कंप्यूटर पर बैठने से
रोक दी जाये बेटी
कोई गीत लिखने से
और किसी सीता के समक्ष
फिर आ जाये अग्नि परीक्षा का प्रस्ताव
और फिर ...........
कहीं डूब न जाये
यह कागज़ यह कलम यह स्याही
सिसकियों में
अटककर रह जाये शब्द
यह भावनाएं ,यह सुरीले गीत
गले की नसों में
रुकिए
जरा तो सोचिये ........
आह !!!
कि यह हलाहल अब पिया नहीं जाता
पिया नहीं जाता ...............
!!!!!!नारी मन !!!!!!!1

मैं हूँ 
वो पौधा 
जिसकी जड़े कही गहरी दबी हैं 
और तना ,फूल पत्ती कही खिल रही है 
कहीं से खींचती हूँ नेह का जल 
कहीं को तृप्त करती हूँ 
दोहरा है मेरे नेह का बंधन 
दोहरी कसक 
दोहरी पीड़ा
दो पाटों के बीच
पिस -पिस कर
करती हूँ सबको तृप्त
कहीं से  टूटना कहीं  जुड़ना ही
मेरा प्रारब्ध है
उलझती हूँ स्वयं ही दोहरी भावनाओं की डालियों  में
शायद इसीलिए
बड़ा कठिन है
समझना नारी मन .......