सोमवार, 15 सितंबर 2014

!!!!!!!!!कसक !!!!!!!!!!!

अम्मा
हर सुबह 
कितने इत्मीनान से तुम चुनती थी 
एक -एक पुष्प 
गूँथती थी माला 
सजाती थी ठाकुरद्वारा 
गूंजते थे घर में 
तुम्हारे भजन के स्वर 
और हम एक
मधुर अहसास के साथ
आँख मिचमिचाते हुए
सबसे पहले
देखते थे
तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा
और मैं
हर सुबह
घडी की सुइयों के पीछे भागते हुए
ढूंढती हूँ
वही मंदिर की घंटियाँ
श्लोकों से स्वर
वो पूजा के फूल
वो इत्मीनान से भरी सुबह
और
भागती जिन्दगी के साथ भागने को तैयार
कुछ ऊँचा उठाने की तलाश में
उतर जाती हूँ घर की सीढियां !!!
एक कसक लिए ..........
वाह रे चित्रकार
एक कोना रंग देना और एक खाली छोड़ देना
तुम्हारे रंगने का
अंदाज़ ही निराला है 

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