सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

                                                            "   महिला स्वास्थ्य "



उसका दोष बस इतना था 
कि वो एक महिला थी
माता -पिता द्वारा
ऋण से उऋण होने
गंगा नहाने हेतु
कच्ची उम्र में
परगोत्री कर दी गयी थी

उसका दोष बस इतना था
उसने प्रथम प्रसव में
एक कन्या जनी थी
फिर एक के बाद एक
तीन कन्याएं गर्भ में
मसली गयी थीं

उसका दोष बस इतना था
कि हाथ जोड़ लिए थे
पति के, सास के आगे
बस अब और नहीं
गिर रही है सेहत,
टूट रहा है शरीर

उसका दोष बस इतना था
कि नारी ही नारी को न समझी
''वंश नहीं चलाएगी!,
नारी तो होती ही है जनने को
नाटक दिखती है
द्वारे की गाय भी तो हर साल
ब्याह जाती है''

उसका दोष बस इतना था
कि वंश के लिए करा था समझौता
सहन कर गयी कमर -पैर का दर्द
बिना उफ़ किये भोगी पेड़ू की सूजन
निशब्द सही अतिशय कमजोरी
पर जब अंतहीन हो गए
वो चार दिन……

उसका दोष बस इतना था
परंपरा,शर्म और संकोच के कारण
कैंसर की अंतिम अवस्था में
पहुंची थी अस्पताल
एक -दो माह के
असाध्य कष्ट के बाद
मिल गयी मुक्ति

उसका दोष बस इतना था
अपने स्वास्थ्य की अनदेखी कर
वंश के नाम कुर्बान होकर
छोड़ गयी एक मासूम संतान
जिसका दोष बस इतना है
कि वो भी बनेगी एक महिला

हर महिला को परिवार के साथ
देना चाहिए अपने स्वास्थ पर ध्यान
प्रतिकार करना है लिंग -परीक्षण का
बार बार गर्भपात ,खून के कमी का
न सिर्फ अपने लिए बल्कि अपनी
संतान के लिए ,समाज के लिए
ताकि कोई संतान ये ना कह सके कि
उसकी माँ का दोष बस इतना था
"कि वो एक महिला थी "

वंदना बाजपेई