गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

Bheed Ka Manovigyan

                                                               ।भीड़ का मनोविज्ञान।


बहुत कठिन है समझना
भीड़ का मनोविज्ञान
जब ये साथ चलती है
उसमे आ जाता है
सौ हाथियों का बल
बड़ी-बड़ी सत्ताएं
हिल जाती हैं
ये जिसे चाहे राजा
बना सकती है
ये जिसे चाहे धूल
चटा सकती है

भीड़ चलते-चलते
रास्ते से एक
पत्थर उठाती है
उसे हीरा बताती है
अचानक सहस्त्र स्वर
स्वर में स्वर मिलाने लगते हैं
वो पत्थर भी खुद बदलने लगता है
और हीरा बनने लगता है

असली हीरे चिल्लाते हैं
पड़े-पड़े धूल खाते हैं
पर भीड़ मानने को
तैयार नहीं होती
उसमें वाद-विवाद
या तकरार नहीं होती
फिर हीरे भी भीड़ में मिल जाते हैं
और पत्थरों को हीरा बताते हैं

अलग ही होता है
भीड़ का हर काम
बहुत कठिन है समझना
भीड़ का मनोविज्ञान

-Vandana Bajpai
(12/12/2013)

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

nadi

                                                                       "नदी "




उछल-उछल कर 
आल्हादित
होती हुई
कल -कल कि
करतल ध्वनि
करती हुई
सब को तृप्त
करती हुई
नदी
कहती है
अगर
सांमजस्य हो तो
बड़ी आसानी से
बह सकती है
दो
सामानांतर
रेखाओ के मध्य
प्रेम की
अविरल धारा

vandana bajpai
(11.12.13) 

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

naseehat

                                                                             ''नसीहत''



मुझे आज भी है याद है 
जब मैं दुल्हन बन
इस घर में आये थी
सासू माँ ने मुँह
दिखाई कि रस्म निभाई थी
वे बोली
नहीं दूँगी तुम्हे
सोने -चाँदी के जेवर
दूंगी बस
एक नसीहत
अगर रूप
है तुम्हारे पास
तो उससे
किसी को क्या लाभ
अगर शिक्षा
है तुम्हारे पास
तो आएगी
तुम्हारे काम
पर मीठी वाणी
वही दे सकती हो
इस परिवार को
बांध सकती हो
घर -संसार को
इसलिए खोल दो
ह्र्दय के द्वार
निकल दो मीठी वाणी का दरिया
सदा आस्वादन करो
 सुख -शांति और प्रेम का
आज जब
अपनी फुलवारी को
महकती हुई पाती हूँ
तो श्रद्धा से
सासू माँ को
नमन करती हूँ

vandana bajpai
(10.12.13)
-  

रविवार, 8 दिसंबर 2013

prem

                                                                        ''प्रेम''


नहीं कर सकती मैं
 सिर्फ तुमसे प्रेम
क्योंकि तुम्हारे मेरे
जीवन में आने से
बहुत पूर्व
यह प्रेम बीज
अंकुरित हो गए थे
मेरे मन में
जब मैंने जनम लिया था
तभी शरू हुआ मेरा
मेरा पहला प्रेम
अपनी माँ से
फिर पिता भाई -बहेन
घर कि दीवारे लाँघते हुए
पहुँच गया स्कूल की
सहपाठियों शिछिकाओ तक
वो चाट वाला जो
अक्सर मेरे दोने में
एक गोलगप्पा ज्यादा रख
''खाई लो बिटिया ''कह कर
मुस्कुरा देता
या वो रिक्शेवाला जो
हर उठती नज़र को घूर कर
डरा देता
और कभी -कभी तुम्हारा     
हाथ पकड़े  
खो जाती हूँ प्रेम में
पेड़ो कि डालियों के
फूलो के ,भवरों के
या फिर रेंगती चीटियों के

प्रेम -प्रेम चिल्लाने से पहले
समझना पड़ेगा
प्रेमको उसके
व्यापक परिपेक्ष में
vandana bajpai
(8.12.13)