।भीड़ का मनोविज्ञान।
बहुत कठिन है समझना
भीड़ का मनोविज्ञान
जब ये साथ चलती है
उसमे आ जाता है
सौ हाथियों का बल
बड़ी-बड़ी सत्ताएं
हिल जाती हैं
ये जिसे चाहे राजा
बना सकती है
ये जिसे चाहे धूल
चटा सकती है
भीड़ चलते-चलते
रास्ते से एक
पत्थर उठाती है
उसे हीरा बताती है
अचानक सहस्त्र स्वर
स्वर में स्वर मिलाने लगते हैं
वो पत्थर भी खुद बदलने लगता है
और हीरा बनने लगता है
असली हीरे चिल्लाते हैं
पड़े-पड़े धूल खाते हैं
पर भीड़ मानने को
तैयार नहीं होती
उसमें वाद-विवाद
या तकरार नहीं होती
फिर हीरे भी भीड़ में मिल जाते हैं
और पत्थरों को हीरा बताते हैं
अलग ही होता है
भीड़ का हर काम
बहुत कठिन है समझना
भीड़ का मनोविज्ञान
-Vandana Bajpai
(12/12/2013)
बहुत कठिन है समझना
भीड़ का मनोविज्ञान
जब ये साथ चलती है
उसमे आ जाता है
सौ हाथियों का बल
बड़ी-बड़ी सत्ताएं
हिल जाती हैं
ये जिसे चाहे राजा
बना सकती है
ये जिसे चाहे धूल
चटा सकती है
भीड़ चलते-चलते
रास्ते से एक
पत्थर उठाती है
उसे हीरा बताती है
अचानक सहस्त्र स्वर
स्वर में स्वर मिलाने लगते हैं
वो पत्थर भी खुद बदलने लगता है
और हीरा बनने लगता है
असली हीरे चिल्लाते हैं
पड़े-पड़े धूल खाते हैं
पर भीड़ मानने को
तैयार नहीं होती
उसमें वाद-विवाद
या तकरार नहीं होती
फिर हीरे भी भीड़ में मिल जाते हैं
और पत्थरों को हीरा बताते हैं
अलग ही होता है
भीड़ का हर काम
बहुत कठिन है समझना
भीड़ का मनोविज्ञान
-Vandana Bajpai
(12/12/2013)
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