बुधवार, 11 दिसंबर 2013

nadi

                                                                       "नदी "




उछल-उछल कर 
आल्हादित
होती हुई
कल -कल कि
करतल ध्वनि
करती हुई
सब को तृप्त
करती हुई
नदी
कहती है
अगर
सांमजस्य हो तो
बड़ी आसानी से
बह सकती है
दो
सामानांतर
रेखाओ के मध्य
प्रेम की
अविरल धारा

vandana bajpai
(11.12.13) 

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