बुधवार, 10 दिसंबर 2014

!!!!!!!!!फेस बुक पर महिलाएं !!!!!!!!!!!!



जरा गौर से देखिये
फेस बुक पर अपने विचारों की
अभिव्यक्ति की तलाश में आई 
ये महिलाएं
आप की ही माँ ,बहन बेटियाँ हैं
जो थक गयी है
खिडकियों से झांकते -झांकते
देखना चाहती है
दरवाज़ों के बाहर
देना चाहती है अपने पखों को
थोडा सा विस्तार
आँचल में समेटना चाहती है
थोडा सा आकाश
कोई हल्दी और तेल सने आँचल से
पोंछते हुए पसीना
चलाती है माउस
कोई घूंघट के नीचे से
थिरकाती है उंगलियाँ की बोर्ड पर
कोई जीवन के स्वर्णिम वर्ष
कर्तव्यों में होम कर
देना चाहती है कुछ अपने को पहचान
कहीं आप का यह असंयत व्यव्हार
यह नाहक वाद -प्रतिवाद
जबरन उठाई गयी उंगलियाँ
अभद्र मेसेज
बेवजह की चैटिंग
रोक न दे इनकी परवाज़
रोक दी जाये एक बहू
कंप्यूटर पर बैठने से
रोक दी जाये बेटी
कोई गीत लिखने से
और किसी सीता के समक्ष
फिर आ जाये अग्नि परीक्षा का प्रस्ताव
और फिर ...........
कहीं डूब न जाये
यह कागज़ यह कलम यह स्याही
सिसकियों में
अटककर रह जाये शब्द
यह भावनाएं ,यह सुरीले गीत
गले की नसों में
रुकिए
जरा तो सोचिये ........
आह !!!
कि यह हलाहल अब पिया नहीं जाता
पिया नहीं जाता ...............
अहसास 


थाम कर जिनका हाथ
पार करनी चाही  थी
अहसासों की
वैतरणी
पिघल गए
समय की
धुप से
आखिरकार
शब्द ही तो थे 
प्रश्न -उत्तर




मेरी हर बात पर
उठ जाती थी तुम्हारी अंगुली
एक नया प्रश्न लेकर 
मैं डरी सहमी सी
खोजती रह जाती थी उत्तर
चाहते न चाहते
एक वर्गीकरण हो ही गया हमारे बीच
मुझे कभी प्रश्न पूछना नहीं आया
और तुम्हे कभी उत्तर देना
                                                 उत्तर  




                                            (चित्र गूगल से साभार )




मुझे चाहिए 
हाँ !मुझे चाहिए 
उन् सारे प्रश्नों के उत्तर 
जो तरल बन- बन कर 
बहते रहे 
माँ और दादी की आँखों के कोरो से
सदियों से जिनको पूछने का साहस नहीं जुटा पाई औरत
सौपती रही एक धरोहर की तरह अगली पीढ़ी को
चुप रहकर ....चुपचाप
सिखाती रही होठ सीने की कला
की कैसे एक दवानल दिल में दबा कर
जलते रहे है घर के चूल्हे
कैसे एक आग को जिन्दा रखने के लिए
सुलगती रही औरत
राख हो जाने तक
!!!!!!!!!अनुमान !!!!!!!!!



पूरी उम्र
चौबीसों घंटे
चारों पहर ,आठों याम 
मखमली दुर्गों की देहरी पर
टंका गहरा पर्दा
करना है अवलोकन उस पार
या लगाना है मात्र अनुमान
चेहरे ,मोहरे ,आकृति ,प्रकृति ,भाव -भंगिमाओं से
सही -गलत
झूठ -सच
धर्म -अधर्म
हे ईश्वर !
ये जीवन इतना दुष्कर क्यों है ?
                                            !!!!!!!!!!अर्ध सत्य !!!!!!!!!!





                                                (चित्र गूगल से साभार )




उगते सूर्य की लालिमा
भर देती है मन में विश्वास की
स्याह घनी रात्रि के बाद 
अवश्य फैलेगा उजास
हो जाता है आशा का संचार
इस विश्वास के साथ की यही सत्य है
चल पड़ता है राही
अस्वीकार करते हुए तथ्य
ठीक बारह घंटे बाद
पुनः लीलेगा
अंधकार उजास को
क्योंकि
अँधेरे के बाद उजाले का
सुख के बाद दुःख का
अनुराग के बाद वैराग्य का
प्रसिद्धि के बाद गुमनामी का
जीवन के बाद मृत्यु का
एक के बाद दूसरे का क्रमानुसार आना
ही जीवन है
यही सत्य है
इसके अतिरिक्त
वह सब कुछ
जो आज है
वर्तमान है ,प्रत्यक्ष है
सब है आधा -अधूरा
सब है
अर्ध सत्य
!!!!!!!!!अचानक !!!!!!!!!!!
सहसा

                                            (चित्र गूगल से साभार )




क्यों मन बंधने लगता है
किसी अपरिचित से 
अचानक
सहसा .........
क्यों मन पिघलने लगता है
किसी अजनबी के दर्द से
अचानक
सहसा .............
क्यों मन नाचने लगता है
बेगानी बरात की धुनों पर
अचानक
सहसा ..............
चौरासी लाख योनियों में घुमते हुए
कहीं न कहीं जुड़े हैं हमारे रिश्ते
पर हमने
अपने मन के चारों ओर
कस रखे हैं
अपरिचित होने हैं पिंजरे
इसीलिये सब दुखी हैं
सब तड़पते हैं
ढूढ़ते हैं
उस शख्स को
जो खोल देगा पिंजरों को
और मुक्त कर देगा मन को
अचानक
सहसा ...................

                                 सफ़र    
  




                                        (चित्र गूगल से साभार )




एक स्त्री जब तय करती है 
पायलों की छन -छन से सैंडल की खट -खट का सफ़र
तो बहुत से सुर डूब जाते हैं उसके अन्दर 
बचना चाहती है कुछ स्वर लहरियों से
अभ्यस्त था जिसका जीवन 
इसलिए चलती है तेज -तेज
उभर आती हैं पसीने की कुछ बूंदे
भिन्न होता है जिनका स्वाद
जब उभरी थी ये
घर का आँगन
गोबर से लीपते हुए
या तुलसी का बिरवा सीचते हुए
पानी और नमक का मिश्रण
कितना पृथक
आह !कितना पृथक ?
एक घर का मान
एक व्यक्ति का सम्मान
तड़पती है औरत
घोलना चाहती दोनों श्रम सीकरों को एक साथ
एक चाँद की शीतलता
एक सूर्य का स्वाभिमान
ढूढती है वो क्षितिज
जहाँ स्वीकार्य होंगे दोनों
क्रम से उदय अस्त
तभी
तभी मान्य होगी
वह है औरत होने से पहले
एक व्यक्ति
                                   !!!!!!!!!!!सिल -बटना !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


                                                   (चित्र गूगल से साभार )
१)
शायद
सूरज अभी अलसा रहा था
पर
चार दीवारों के मध्य
छिड रही थी सरगम
कुछ देवी गीत
और
चल रहा था बटना सिल पर
घर्रर -घर्रर
मैं डूबना चाहता था
अपने किशोर उम्र के सपनों में
आती थी जिसमें परियां
२)
शायद
सूरज अभी अलसा रहा था
पर
चार दीवारों के मध्य
छिड रही थी सरगम
कुछ देवी गीत
और
चल रहा था बटना सिल पर
घर्रर -घर्रर
मैं डूबना चाहता था
अपने जवान उम्र के सपनों में
जिसमे आते थे
मेरी समस्याओं के हल
ठीक केकुले के सपने में आई
बेंजीन रिंग की तरह
३)
शायद
सूरज अभी अलसा रहा था
पर उठाना पड़ा
क्योंकि इस उम्र में नहीं आते
हसींन सपने
न समस्याओं के हल
बेंजीन रिंग की तरह
वीभत्स सपनों में देखती है
मकान के लोन की किस्तें
बच्चों के स्कूल की फीस
कार्यालय का बोझ
सैंकड़ों कर्तव्य
४)
आह !
पर अब नहीं सुनाई पड़ते
कंठ से फूटे देवी गीत
मधुर सरगम
आती है कंठ में
कफ के घरघराने की आवाज़
देखता हूँ
मिक्सी के आगमन से पदच्युत हुआ सिल -बटना
रसोई के कोने में
जर्जर देह
कि अब उससे अल सुबह उठा नहीं जाता
देखता हूँ
झुर्रियों की तरह जमी हैं धुल की परतें
दन्त -विहीन पोपले मुह की तरह
घिसे दांत
प्रति -पल प्रतीक्षा रत
जब दो हाँथ
पुन:
थाम लेंगे उसे

५)
कुछ आकुल सा
मिलाने लगता हू
साम्यता
याद आने लगते है
वो किशोरावस्था के हसीन सपने
वो युवावस्था के आकाश पाने के सपने
वो समस्याओं के हल
वो सिल -बटने की
घर्रर -घर्रर
वो मेरी बेचैनी
अचानक ही सजल हो जाती हैं मेरी आँखें
कातर दृष्टि से
देखता हूँ
पहले सिल -बटने को
फिर बिस्तर पर सिकुड़ी जर्जर देह को
उठता है एक प्रश्न
गीली आँखों में
क्या पिस रहा था इसमें
बरस दर बरस
मसाला या .......................?
वंदना बाजपेयी