!!!!!!!!!!!सिल -बटना !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
(चित्र गूगल से साभार )
१)
शायद
सूरज अभी अलसा रहा था
पर
चार दीवारों के मध्य
छिड रही थी सरगम
कुछ देवी गीत
और
चल रहा था बटना सिल पर
घर्रर -घर्रर
मैं डूबना चाहता था
अपने किशोर उम्र के सपनों में
आती थी जिसमें परियां
शायद
सूरज अभी अलसा रहा था
पर
चार दीवारों के मध्य
छिड रही थी सरगम
कुछ देवी गीत
और
चल रहा था बटना सिल पर
घर्रर -घर्रर
मैं डूबना चाहता था
अपने किशोर उम्र के सपनों में
आती थी जिसमें परियां
२)
शायद
सूरज अभी अलसा रहा था
पर
चार दीवारों के मध्य
छिड रही थी सरगम
कुछ देवी गीत
और
चल रहा था बटना सिल पर
घर्रर -घर्रर
मैं डूबना चाहता था
अपने जवान उम्र के सपनों में
जिसमे आते थे
मेरी समस्याओं के हल
ठीक केकुले के सपने में आई
बेंजीन रिंग की तरह
शायद
सूरज अभी अलसा रहा था
पर
चार दीवारों के मध्य
छिड रही थी सरगम
कुछ देवी गीत
और
चल रहा था बटना सिल पर
घर्रर -घर्रर
मैं डूबना चाहता था
अपने जवान उम्र के सपनों में
जिसमे आते थे
मेरी समस्याओं के हल
ठीक केकुले के सपने में आई
बेंजीन रिंग की तरह
३)
शायद
सूरज अभी अलसा रहा था
पर उठाना पड़ा
क्योंकि इस उम्र में नहीं आते
हसींन सपने
न समस्याओं के हल
बेंजीन रिंग की तरह
वीभत्स सपनों में देखती है
मकान के लोन की किस्तें
बच्चों के स्कूल की फीस
कार्यालय का बोझ
सैंकड़ों कर्तव्य
शायद
सूरज अभी अलसा रहा था
पर उठाना पड़ा
क्योंकि इस उम्र में नहीं आते
हसींन सपने
न समस्याओं के हल
बेंजीन रिंग की तरह
वीभत्स सपनों में देखती है
मकान के लोन की किस्तें
बच्चों के स्कूल की फीस
कार्यालय का बोझ
सैंकड़ों कर्तव्य
४)
आह !
पर अब नहीं सुनाई पड़ते
कंठ से फूटे देवी गीत
मधुर सरगम
आती है कंठ में
कफ के घरघराने की आवाज़
देखता हूँ
मिक्सी के आगमन से पदच्युत हुआ सिल -बटना
रसोई के कोने में
जर्जर देह
कि अब उससे अल सुबह उठा नहीं जाता
देखता हूँ
झुर्रियों की तरह जमी हैं धुल की परतें
दन्त -विहीन पोपले मुह की तरह
घिसे दांत
प्रति -पल प्रतीक्षा रत
जब दो हाँथ
पुन:
थाम लेंगे उसे
आह !
पर अब नहीं सुनाई पड़ते
कंठ से फूटे देवी गीत
मधुर सरगम
आती है कंठ में
कफ के घरघराने की आवाज़
देखता हूँ
मिक्सी के आगमन से पदच्युत हुआ सिल -बटना
रसोई के कोने में
जर्जर देह
कि अब उससे अल सुबह उठा नहीं जाता
देखता हूँ
झुर्रियों की तरह जमी हैं धुल की परतें
दन्त -विहीन पोपले मुह की तरह
घिसे दांत
प्रति -पल प्रतीक्षा रत
जब दो हाँथ
पुन:
थाम लेंगे उसे
५)
कुछ आकुल सा
मिलाने लगता हू
साम्यता
याद आने लगते है
वो किशोरावस्था के हसीन सपने
वो युवावस्था के आकाश पाने के सपने
वो समस्याओं के हल
वो सिल -बटने की
घर्रर -घर्रर
वो मेरी बेचैनी
अचानक ही सजल हो जाती हैं मेरी आँखें
कातर दृष्टि से
देखता हूँ
पहले सिल -बटने को
फिर बिस्तर पर सिकुड़ी जर्जर देह को
उठता है एक प्रश्न
गीली आँखों में
क्या पिस रहा था इसमें
बरस दर बरस
मसाला या .......................?
वंदना बाजपेयी

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