शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

                                         #################आस्तिक या नास्तिक ##################



 अक्सर यह प्रश्न 
यहां कौन आस्तिक कौन नास्तिक? 
 आदि -अंत विहीन 
एक वलय  की तरह घेर लेता है  मुझे 
सबकी तरह 
मैंने भी तो गढ़ी थी 
ईश्वर की परिभाषा 
और बना लिया था एक रिश्ता 
आस्था के प्रतीकों के साथ 
अपनी श्रद्धा और उसकी दया के मध्य 
बैठा ही लिया था 
गणित का एक फार्मूला 
देने और लेने का ……… 
श्रद्धा के बदले ढूँढा था दाता 
काशी से काबा तक
सारनाथ से जेरुसलम तक 
मिल जाने पर जय जय कार 
न मिलने पर उस पर लगाये थे 
प्रश्नचिन्ह ?
कब किया था प्रेम 
अस्तित्व से 
मीरा की तरह टूट कर 
देने लेने से परे 
प्रेम सिर्फ प्रेम के लिए 
हत भाग्य !!!
कहाँ जाना था ईश्वर को 
 प्रेम के उस स्वरुप में
जो हमारे बीच प्रवाहित है 
प्रेम की एक सतत धारा में  
मैंने भी किया था व्यापार 
और व्यापार में
 नफा -नुकसान  लाज़मी सा है 
 

                                                       !!!!!!!!!!!!!!!!!समर्पण !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


बचपन में 
स्मरण नहीं कब .............
जब  , अम्मा ने
बताया था शिवोपासना का महत्त्व
 कि शिव -पार्वती  सा होता है
पति -पत्नी का बंधन
 और मेरे केश गूँथते हुए
बाँध दिया था मेरा मन
तुम्हारे लिए

तब अनदेखे -अनजाने ही
तुम लगने लगे थे
चिर -परिचित
और तभी से
शुरू हो गया था
मेरा समर्पण
तुम्हारे लिए


जब तुम थे अलमस्त
गुल्ली -डंडा खेलने में
तब नंगे पाँव
शुरू हो गयी थी मेरी यात्रा
शिवाले की तरफ
तुम्हारे लिए


जब तुम किशोरावस्था में
मित्रों के साथ
गली चौराहे , नुक्कड़ पर
आनंद ले रहे थे जीवन  का
मैं जल रही थी
नन्हा सा दिया
तुलसी के नीचे
तुम्हारे लिए


जब तुम सफलता के हिमालय पर
चढ़ने के लिए
लगा रहे थे
ऐड़ी -चोटी का जोर
मैंने शुरू कर दिए थे
सोलह सोमवार के व्रत
तुम्हारे लिए


वर्षों  अनदेखा -अंजाना
 रिश्ता निभाने के बाद
जब अग्नि को साक्षी मान मंत्रोच्चार के साथ
किया था तुम्हारे जीवन में प्रवेश
तब से
पायलों की छन -छन से
चूड़ी की खन -खन से
माथे की बिंदियाँ से
हाथों की मेहँदी से
सुर और रंग में ढलती ही रही हूँ
तुम्हारे लिए


जब -जब सूखने लगा तुम्हारा जीवन
शोक और दर्द की ऊष्मा से
तो भरने को दरारे
सावन की बदली बन बरसी हूँ
तुम्हारे लिए

पर क्यों यह प्रश्न
कौंधता है
बिजली सम मन में
अब बता भी दो ना
क्या बचपन से लेकर आज तक
तुम्हारे मन में भी रहा है
वैसा ही समर्पण
मेरे लिए.………………


















बुधवार, 6 अगस्त 2014

                                        ###########पक्के रंग ##########


कितनी खुश थी मैं 
जब माँ ने बताया था
की परी रानी आधी रात को
दे गयी है मुझे एक
अनोखा उपहार
कोमल सा नाजुक सा
जिसे अपनी नन्ही गोद में लिटा
घंटों खेलती
हाँ ! भैया तुम मेरी गुडियाँ में तब्दील हो गए

कब वो नन्हे -नन्हे हाँथ-पाँव  बढ़ने लगे
शुरू हो गया संग खेलना
मेज के नीचे घर का बनाना
मिटटी के बर्तन में खाना
रूठना -मानना
तकिये के नीचे टॉफ़ी छिपाना
हाँ ! भैया तुम मेरे दोस्त में तब्दील हो गए

जब बढ़ गया तुम्हारा कद मेरे कद से
तो हो गए जैसे  बड़े उम्र में
सजग -सतर्क
 रखने लगे मेरा ख़याल
कॉलेज ले जाना,  लाना
मेरा हाथ बटाना
मेरी छोटी -छोटी खुशियों का ध्यान
हां भैया ! तुम मेरे संरक्षक में तब्दील हो गए


और उम्र के इस दौर में
जब मेरे दर्द पर भर आती है तुम्हारी आँखें
निभाते हो  जिम्मेदारियाँ
फेरते हो सर पर स्नेहिल हाँथ
मौन ही कह जाते हो
चिंता मत करो" मैं हूँ  तुम्हारे साथ "
कब ! पता नहीं कब ?
मेरे भाई ! तुम मेरे पिता में तब्दील हो गए

आज तुमको भेजते हुए राखी
बार -बार कह रहा है मन
मेरी गुड़ियाँ , मेरे भाई , संरक्षक , मेरे पिता
बड़ा अनमोल है अपना यह रिश्ता
क्योंकि
कुछ धागों के रंग कभी कच्चे नहीं होते
  समय बीतने के साथ
साल दर साल
यह और मजबूत और गहरे
और पक्के होते जाते हैं

सोमवार, 4 अगस्त 2014

                                          !!!!!!!!!!!!!!!बस बहुत हुआ !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!



वातावरण में अजीब सी उमस है 
बंद  है हवा 
बढ़ रहा है ताप 
फूटने ही वाला है ज्वालामुखी 
 हाँ 
पिघल -पिघल कर् निकलने वाले  हैं 
वो काले हर्फ़ 
जिन्हे सफ़ेद पोशों ने 
छिपा के रखा है 
अपने अंदर 
जो 
किसी हस्ताक्षर में कैद 
सुनहरी जिल्द में दफ़न 
बढ़ा रहे है
प्रतिष्ठित  बैठकों की शोभा 
 कब से चिल्ला -चिल्ला कर कह रहे थे
बस अब बहुत हुआ 
की ये किताब भी अब पढ़ी जानी  चाहिए