बुधवार, 6 अगस्त 2014

                                        ###########पक्के रंग ##########


कितनी खुश थी मैं 
जब माँ ने बताया था
की परी रानी आधी रात को
दे गयी है मुझे एक
अनोखा उपहार
कोमल सा नाजुक सा
जिसे अपनी नन्ही गोद में लिटा
घंटों खेलती
हाँ ! भैया तुम मेरी गुडियाँ में तब्दील हो गए

कब वो नन्हे -नन्हे हाँथ-पाँव  बढ़ने लगे
शुरू हो गया संग खेलना
मेज के नीचे घर का बनाना
मिटटी के बर्तन में खाना
रूठना -मानना
तकिये के नीचे टॉफ़ी छिपाना
हाँ ! भैया तुम मेरे दोस्त में तब्दील हो गए

जब बढ़ गया तुम्हारा कद मेरे कद से
तो हो गए जैसे  बड़े उम्र में
सजग -सतर्क
 रखने लगे मेरा ख़याल
कॉलेज ले जाना,  लाना
मेरा हाथ बटाना
मेरी छोटी -छोटी खुशियों का ध्यान
हां भैया ! तुम मेरे संरक्षक में तब्दील हो गए


और उम्र के इस दौर में
जब मेरे दर्द पर भर आती है तुम्हारी आँखें
निभाते हो  जिम्मेदारियाँ
फेरते हो सर पर स्नेहिल हाँथ
मौन ही कह जाते हो
चिंता मत करो" मैं हूँ  तुम्हारे साथ "
कब ! पता नहीं कब ?
मेरे भाई ! तुम मेरे पिता में तब्दील हो गए

आज तुमको भेजते हुए राखी
बार -बार कह रहा है मन
मेरी गुड़ियाँ , मेरे भाई , संरक्षक , मेरे पिता
बड़ा अनमोल है अपना यह रिश्ता
क्योंकि
कुछ धागों के रंग कभी कच्चे नहीं होते
  समय बीतने के साथ
साल दर साल
यह और मजबूत और गहरे
और पक्के होते जाते हैं

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