!!!!!!!!!!! दुविधा !!!!!!!!!!!
बचपन से ही
पता नहीं क्यों
बहुत भाता रहा है आकाश
स्वच्छ नीला
अनंत विस्तार
कई बार जाना चाहा
बादलों के पार
बाँध लिए
स्वप्नों के पंख
जूटा ली हिम्मत
और खोल दी खिड़की
पर हर बार
ना जाने क्यों
बज गयी मेरी पायल
ठिठक गए मेरे पाँव
शायद
सदियों से परम्पराओं ने
पहना रखी थी
जो बेड़ियां
उसी धुरी पर नाचना
बन गया था मेरा प्रारब्ध
आदत सी हो गया था
उसका संगीत
भय था
कही तेज हवाओं की रफ़्तार में
बिखर न जाये
जिसकी धुन पर आदतन
नाच रही है सृष्टि
बंद कर ली खिड़की
और कस ली पायल
हाँ !शायद अब ठीक है
या शायद……………
बचपन से ही
पता नहीं क्यों
बहुत भाता रहा है आकाश
स्वच्छ नीला
अनंत विस्तार
कई बार जाना चाहा
बादलों के पार
बाँध लिए
स्वप्नों के पंख
जूटा ली हिम्मत
और खोल दी खिड़की
पर हर बार
ना जाने क्यों
बज गयी मेरी पायल
ठिठक गए मेरे पाँव
शायद
सदियों से परम्पराओं ने
पहना रखी थी
जो बेड़ियां
उसी धुरी पर नाचना
बन गया था मेरा प्रारब्ध
आदत सी हो गया था
उसका संगीत
भय था
कही तेज हवाओं की रफ़्तार में
बिखर न जाये
जिसकी धुन पर आदतन
नाच रही है सृष्टि
बंद कर ली खिड़की
और कस ली पायल
हाँ !शायद अब ठीक है
या शायद……………