ध्यान, साधना, यम नियम, प्राणायाम
प्रयास या अभ्यास
असंभव है स्मृतियों के दग्ध कोश की
इच्छित सुसज्जा
काल की धारा में बहते हुए भी
वो छोड़ ही जाती हैं
चुभती- गड़ती किरचें
यहाँ-वहाँ, इधर-उधर, सर्वत्र
सयास भूलने के क्रम में
जुगत लगाती
बुद्धि भी कहाँ है सीमाहीन
बस झाड़ बटोरकर
किसी सुगृहणी सम कर देती है एक तरफ
होता है दृष्टिगोचर बाह्य विन्यास
ताज़ा लीपे हुए मिट्टी के घर सा
खुरच-खुरच जाने की नियति लिए
जब अचानक हो जाता है स्पर्श
ध्यान की हथेली का
तो पुनः पुनः रक्तरंजित हो उठता है
आत्मा का सबसे सुरक्षित कोना
हाँ ! अश्वत्थामा हैं हम
प्रेम और रिश्तों के नाम पर
किसी अपने के धोखे के शिकार
ढोते हुए स्मृतियों का
रक्त और पीब से भरा घाव
काल और समय से परे
अस्थिर, असंतुलित, अभिशप्त
वंदना बाजपेयी
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