गुरुवार, 28 नवंबर 2013

man

मन  

मन मेरे मुझ पर तुम क्यों
अपना अधिकार जताते हो ?
जब मैं एक धुन पर मगन हुई
तुम खींच कहीं ले जाते हो

तुम प्रेमी हो कुछ अनगढ़ से
जो हर डाली पर लटक रहे
मैं कैसे ह्रदय द्वार खोलूं
यायावर से तुम भटक रहे

अक्सर मुझे छोड़ अकेले में
तुम और कहीं मुड़  जाते हो

जीवन भर साथ निभाने की
जब कसम उठाई है तुमने
तो दिल पर रखकर हाथ कहो
क्या प्रीत निभाई है तुमने ?

मैं धीरे-धीरे चलती हूँ
तुम पल-भर में उड़ जाते हो

मैं जानती हूँ मैं ही हारूँगी
तुम को ही मिलेगी जीत नई
एकतरफा प्रीत निभाने की
होती है जगत में रीत यही

सर्वाधिकार सुरक्षित कर
तुम बहुत-बहुत इठलाते हो
मन मेरे मुझ पर तुम क्यों
अपना अधिकार जताते हो ?

-Vandana Bajpai


बुधवार, 27 नवंबर 2013

Ashubh : Part 5

                                                                        कहानी 
                                                                 (अशुभ : Part 5)

सास कड़क आवाज़ में बोली ,"ब्याह तो कर लिया है पर साल भर तक गृह-प्रवेश नहीं करने दूंगी। पहले देख तो लूं ये हमारे परिवार के लिए कितनी अशुभ है। " उसे बाहर का कमरा मिल गया जहाँ से वो पीछे के दरवाज़े से अंदर रसोई तक जाती ,दिन भर खाना बनाती ,रात में अपने कमरे में आकर अकेले सो जाती। साल बीतने लगा...
          पड़ोसी  की चाची की सास मर गईं वो अशुभ ,कल्लू कुमार की लड़की भाग गई … वो अशुभ और चार घर छोड़ जो बनारसी दास चाचा रहते हैं उनकी भैंस… जो पिछले 10 साल से उनकी सेवा कर रही थी गुज़र
गई … च च च च ! धीरे-धीरे उसकी अशुभता की सूची लम्बी होने लगी। सास ने अपने बेटे की दूसरी शादी तय कर दी। कौन नहीं चाहेगा कि उसका माल दो बार बिके। दोबारा दहेज़ ,गाना-बजाना वाह!…
          उस अभागन की तरफ से बोलने वाला कौन था ? नयी बहु आई। गाना-बजाना ,हंसी-ख़ुशी में 15 दिन निकल गए। फिर अचानक सास को साँप ने काट लिया। सास तो परलोक सिधार गई पर दोष उस बेचारी पर आया। सौतिया-डाह हो गया होगा ,उसने पानी पी-पी कर कोसा होगा  तभी तो… पति ने चोटी पकड़ खींचते हुए उसे घर से बाहर कर दिया।
          रोती-तड़पती माँ के पास आई। माँ व राघव का दिल किसी अशुभ कि आशंका से फिर धड़कने लगा। सबकी सहमति से राघव उसे मथुरा के अबला-केंद्र में छोड़ आया।

क्रमशः ...
To Be Continued...

-Vandana Bajpai


मंगलवार, 26 नवंबर 2013

Ashubh:Part 4

                                                                              कहानी
                                                                       (अशुभ : Part 4)


विधि कि कितनी विडंबना थी कि घर में राघव के जन्म पर ढोलक बज रही थी। हर आने-जाने वाला राघव को प्यार कर रहा था पर वो अपने भाई को देख भी नहीं सकती थी। माँ को भय था अगर उस अशुभ की छाया राघव पर पड़ जाएगी तो राघव भी भगवान के घर चला जाएगा।
                                                     शकुन-अपशकुन का भय या मानसिक रोग। माँ एक मानसिक बीमारी से जूझ रही थीं । उन्हें इलाज कि ज़रुरत थी । ये अनपढ़ समाज कहाँ समझ पाया। वो तो राघव के हर जन्मदिन पर माँ को शाबाशी दे देता कि "जो तुम इस अशुभ को राघव से दूर रख रही हो वह सही है। " और वो… अल्हड़-नादान भी दिल की गहराईयों से मानने लगी कि वो अशुभ है। अगर उसकी छाया भी राघव पर पड़ी तो…  नहीं! वो ये कभी नहीं होने देगी। कभी छुपकर वात्सल्य-वश भाई को खेलते देख लेती तो खुद ही अपराध बोध से ग्रस्त हो जाती। घंटो माला जपती ,"  हे प्रभु! मेरे भाई की रक्षा करना।"
                                                   उससे अलग राघव को घुट्टी की तरह पिलाया गया था कि ये बहन तुम्हारे लिए अशुभ है ! काल है! खा जाएगी तुम्हे ! राघव का बाल मन भय ग्रस्त हो गया। वो उसे देखते ही दूर भाग जाता।
समय पंख लगाकर उड़ गया। दुलारी उर्फ़ अशुभ, प्रेम , की अतृप्त प्यास लिए ससुराल कि देहली पर खड़ी हो गई। पर शायद उसका नाम उससे पहले ही वहाँ पहुँच गया था। हाथ में आरती का थाल लिए सास के हाथ थरथराने लगे। उन्होंने फरमान जारी कर दिया…

क्रमशः ...
To Be Continued...

-Vandana Bajpai



सोमवार, 25 नवंबर 2013

Ashubh:Part 3

                                                                          कहानी
                                                                   (अशुभ : Part 3)

कुछ ऐसा ही माहौल था। उसके छोटे भाई , 1 वर्ष के छोटू की मृत्यु का मातम मन रहा था। माँ छाती पीट-पीट कर रो रही थी। उसके बाद एक के बाद एक तीन भाइयों को साल पूरा होने से पहले ही काल ने लील लिया था। माँ बदहवास सी हो गई थी। वो कोने में खड़ी टुकुर-टुकुर माँ को रोते हुए देख रही थी।
तभी उसकी चचेरी दादी आईं। वह माँ से लिपटकर रोने लगीं। माँ हिचकी बाँध कर रोने लगीं,चची हमारा नसीब ही खोटा है। दादी माँ के आंसू पोछते हुए बोलीं ,"नाही बहु ,ईमा तुम्हार दोस नाहि , ई तो ई बिटिया तुम्हार दुलारी असुभ है। ऊकी पीठ पर भाई टिकत ही नाही।  करमजली कुल को खाने वाली।"
                                                                            पता नहीं दादी की बात का माँ पर क्या असर हुआ। माँ अचानक उठकर मेरे पास आईं और कपडा धोने की मुगरी से मुझे पीटने लगीं। वो चिल्लाती जा रही थी ,"अशुभ!… अशुभ… अशुभ!!" वो दिन था और माँ के परलोक परायण का दिन… मुझे कभी भी माँ का प्यार नहीं मिला।
                और पिता … पिता बाहर मुम्बई में काम करते थे। साल में एक बार आते और अगली बार तब आते जब भाई या बहन कि संख्या में इजाफ़ा हो जाता।  इस घटना के बाद न जाने क्या हुआ कि पिता को भी उससे विरक्ति हो गई। अपने ही घर में माँ-बाप के द्वारा तिरस्कृत दुलारी गेहूं के खेत में खर-पतवार की तरह बढ़ने लगी। जो बढ़ तो रही है सिर्फ काट कर फेंके जाने के लिए। उसके बाद बहन रज्जो हुई फिर उस भाग्यशालनी की पीठ पर भाई राघव।

क्रमशः… 
to be continued...

-Vandana Bajpai


रविवार, 24 नवंबर 2013

Mahatv




तुम फूल बने हो मधुबन के
क्यों डाली पर इठलाते हो
क्या तुमने ये जग  जीत लिया
जो जंगल में पुष्प खिलता है
वो भी  तो खुशबु देता है ।

तुम बने हो मंदिर का दिया
क्यों खुद को भगवान समझते हो
क्या तुमने ये जग जीत लिया
जो दीपक कुटिया में जलता है
वो भी तो अँधियारा हरता है ।

तुम बने हो राजा देश के
क्यों सब पर रौब जमाते हो
क्या तुमने ये जग जीत लिया
जो भिखारी भीख मांगता है
वो भी एक पात्र निभाता है ।

तुम फाइव स्टार के पिज़्ज़ा बने
क्यों इतना इतराया करते हो
क्या तुमने ये जग जीत लिया
रोटी गेहूं की जो होती है
वो भी तो भूख मिटाती है ।

तुम हो ऊंचे ओहदे वाले
क्यों इतना अकड़ा करते  हो
क्या तुमने ये जग जीत लिया
जो जीवन की दौड़ में हारा है
वो भी माँ की आँख का तारा है ।


-Vandana Bajpai