कहानी
(अशुभ : Part 3)
कुछ ऐसा ही माहौल था। उसके छोटे भाई , 1 वर्ष के छोटू की मृत्यु का मातम मन रहा था। माँ छाती पीट-पीट कर रो रही थी। उसके बाद एक के बाद एक तीन भाइयों को साल पूरा होने से पहले ही काल ने लील लिया था। माँ बदहवास सी हो गई थी। वो कोने में खड़ी टुकुर-टुकुर माँ को रोते हुए देख रही थी।
तभी उसकी चचेरी दादी आईं। वह माँ से लिपटकर रोने लगीं। माँ हिचकी बाँध कर रोने लगीं,चची हमारा नसीब ही खोटा है। दादी माँ के आंसू पोछते हुए बोलीं ,"नाही बहु ,ईमा तुम्हार दोस नाहि , ई तो ई बिटिया तुम्हार दुलारी असुभ है। ऊकी पीठ पर भाई टिकत ही नाही। करमजली कुल को खाने वाली।"
पता नहीं दादी की बात का माँ पर क्या असर हुआ। माँ अचानक उठकर मेरे पास आईं और कपडा धोने की मुगरी से मुझे पीटने लगीं। वो चिल्लाती जा रही थी ,"अशुभ!… अशुभ… अशुभ!!" वो दिन था और माँ के परलोक परायण का दिन… मुझे कभी भी माँ का प्यार नहीं मिला।
और पिता … पिता बाहर मुम्बई में काम करते थे। साल में एक बार आते और अगली बार तब आते जब भाई या बहन कि संख्या में इजाफ़ा हो जाता। इस घटना के बाद न जाने क्या हुआ कि पिता को भी उससे विरक्ति हो गई। अपने ही घर में माँ-बाप के द्वारा तिरस्कृत दुलारी गेहूं के खेत में खर-पतवार की तरह बढ़ने लगी। जो बढ़ तो रही है सिर्फ काट कर फेंके जाने के लिए। उसके बाद बहन रज्जो हुई फिर उस भाग्यशालनी की पीठ पर भाई राघव।
क्रमशः…
to be continued...
-Vandana Bajpai
(अशुभ : Part 3)
कुछ ऐसा ही माहौल था। उसके छोटे भाई , 1 वर्ष के छोटू की मृत्यु का मातम मन रहा था। माँ छाती पीट-पीट कर रो रही थी। उसके बाद एक के बाद एक तीन भाइयों को साल पूरा होने से पहले ही काल ने लील लिया था। माँ बदहवास सी हो गई थी। वो कोने में खड़ी टुकुर-टुकुर माँ को रोते हुए देख रही थी।
तभी उसकी चचेरी दादी आईं। वह माँ से लिपटकर रोने लगीं। माँ हिचकी बाँध कर रोने लगीं,चची हमारा नसीब ही खोटा है। दादी माँ के आंसू पोछते हुए बोलीं ,"नाही बहु ,ईमा तुम्हार दोस नाहि , ई तो ई बिटिया तुम्हार दुलारी असुभ है। ऊकी पीठ पर भाई टिकत ही नाही। करमजली कुल को खाने वाली।"
पता नहीं दादी की बात का माँ पर क्या असर हुआ। माँ अचानक उठकर मेरे पास आईं और कपडा धोने की मुगरी से मुझे पीटने लगीं। वो चिल्लाती जा रही थी ,"अशुभ!… अशुभ… अशुभ!!" वो दिन था और माँ के परलोक परायण का दिन… मुझे कभी भी माँ का प्यार नहीं मिला।
और पिता … पिता बाहर मुम्बई में काम करते थे। साल में एक बार आते और अगली बार तब आते जब भाई या बहन कि संख्या में इजाफ़ा हो जाता। इस घटना के बाद न जाने क्या हुआ कि पिता को भी उससे विरक्ति हो गई। अपने ही घर में माँ-बाप के द्वारा तिरस्कृत दुलारी गेहूं के खेत में खर-पतवार की तरह बढ़ने लगी। जो बढ़ तो रही है सिर्फ काट कर फेंके जाने के लिए। उसके बाद बहन रज्जो हुई फिर उस भाग्यशालनी की पीठ पर भाई राघव।
क्रमशः…
to be continued...
-Vandana Bajpai

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