मंगलवार, 26 नवंबर 2013

Ashubh:Part 4

                                                                              कहानी
                                                                       (अशुभ : Part 4)


विधि कि कितनी विडंबना थी कि घर में राघव के जन्म पर ढोलक बज रही थी। हर आने-जाने वाला राघव को प्यार कर रहा था पर वो अपने भाई को देख भी नहीं सकती थी। माँ को भय था अगर उस अशुभ की छाया राघव पर पड़ जाएगी तो राघव भी भगवान के घर चला जाएगा।
                                                     शकुन-अपशकुन का भय या मानसिक रोग। माँ एक मानसिक बीमारी से जूझ रही थीं । उन्हें इलाज कि ज़रुरत थी । ये अनपढ़ समाज कहाँ समझ पाया। वो तो राघव के हर जन्मदिन पर माँ को शाबाशी दे देता कि "जो तुम इस अशुभ को राघव से दूर रख रही हो वह सही है। " और वो… अल्हड़-नादान भी दिल की गहराईयों से मानने लगी कि वो अशुभ है। अगर उसकी छाया भी राघव पर पड़ी तो…  नहीं! वो ये कभी नहीं होने देगी। कभी छुपकर वात्सल्य-वश भाई को खेलते देख लेती तो खुद ही अपराध बोध से ग्रस्त हो जाती। घंटो माला जपती ,"  हे प्रभु! मेरे भाई की रक्षा करना।"
                                                   उससे अलग राघव को घुट्टी की तरह पिलाया गया था कि ये बहन तुम्हारे लिए अशुभ है ! काल है! खा जाएगी तुम्हे ! राघव का बाल मन भय ग्रस्त हो गया। वो उसे देखते ही दूर भाग जाता।
समय पंख लगाकर उड़ गया। दुलारी उर्फ़ अशुभ, प्रेम , की अतृप्त प्यास लिए ससुराल कि देहली पर खड़ी हो गई। पर शायद उसका नाम उससे पहले ही वहाँ पहुँच गया था। हाथ में आरती का थाल लिए सास के हाथ थरथराने लगे। उन्होंने फरमान जारी कर दिया…

क्रमशः ...
To Be Continued...

-Vandana Bajpai



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