मंगलवार, 8 नवंबर 2016

थाली में चाँद






जब - जब आसमान में देख कर चमकता चाँद 
पाने को हुई बेचैन
उतार लिया थाली में 
भर कर कर पानी 
हो गयी स्वप्नों के खेल में व्यस्त 
तब - तब 
रात बीतते ही यथार्थ के सूरज ने
उगते ही  सोख लिया 
थाली का पानी 
फिर एक पल भी टिक न सका चाँद का प्रतिबिम्ब 
और आसमान का चाँद इठलाता रहा अपने अस्तित्व पर 
की मन बहलाने का खेल नहीं है 
चाँद को पाना 
जब जब 
झेलोगे   सूर्य की तपिश 
चाँद स्वयं उतर आएगा 
हथेली की थाली में 
साक्षात् 


व्रत करती हुई स्त्रियाँ





व्रत करती हुई स्त्रियाँ
पति की दीर्घायु और मंगलकामना के लिए
देवी गीतों को गाती हुई
बड़ी ही आसानी भूल जाती भूख प्यास
व्रत करती हुई स्त्रियाँ
सजाती हैं सुहाग पिटारी
चुनती है फूल
दिन भर रसोई में
बनाती है प्रसाद

दीपावली की सफाई के दौरान अक्सर


दीपावली की सफाई के दौरान अक्सर
निकल आती है कई पुरानी यादें
कुछ तोडती हुई , कुछ जोडती हुई
कुछ पुराने संदूक में दफनाई हुई
कुछ चद्दरों की तहाई हुई
कुछ पुरानी डायरी के पीले होते हुए पन्नों में
किसी सूखे गुलाब की तरह
कुछ जो शायद उग नहीं पायी थी पूरी तरह तब
यूँ ही फेंक दी गयी थी अधबनी
बिखर गए थे जिनके बीज

सोमवार, 7 नवंबर 2016

साक्षी है ये जिंगला




साक्षी है ये झरोखा
और साक्षी  है उसमें लगा ये जिंगला 
की मैंने स्वीकार कर लिया था 
उसको 
अपनी जिंदगी का एक हिस्सा समझ कर 
की मुट्ठी भर दानों के बदले में 
दिन भर फुदकना 
और ची - ची के स्वर से घर को गुंजायमान करना 


साक्षी है ये जिंगला