सोमवार, 10 मार्च 2014

                                                              "बेचैनी "



याद आता है 
जब मेरे विवाह की
बात चलने लगी थी
माँ ने
शरू कर दिया था रखना
एक अलग
बक्से में
मेरे
कुछ पुराने
दुपटटे ,टूटी गुड़ियाँ
काजल की डिबिया
जैसे समेटना चाहती हो
मेरे बचपन को
अपनी स्मृतीयो में
"अजीब सी बेचैनी थी माँ के मन में "
और अब
जैसे -जैसे
बढ़ती जा रही हैं
माँ के चेहरे कि झुरियाँ
मैंने समेटना शुरू
कर दिया है
माँ कि स्मृतियों को
मांग ली है
वो पुरानी साड़ी
जो माँ ने
इतनी बार पहनी है
कि बस गयी है उसमे
माँ की खुश्बू
और वो
शालिग्राम की बटिया
जिस पर वर्षों
चन्दन घिसते -घिसते
शायद माँ की
उँगलियों का अंश
समाहित हो गया है
अपलक देखती हूँ
माँ को
जिससे
अंदर  -अंदर
इतना अंदर की
आत्मा तक समाहित हो जाये
माँ का चेहरा
"अजीब से बेचैनी है मेरे मन में "

वंदना बाजपेई