बुधवार, 31 दिसंबर 2014

चाहत 


बहुत सोचती थी
बहुत चाहती थी
कही तो सफ़र में किनारा बने
जाता है जब कोई दूजे जहाँ में
कहतें है रहता है आसमान में
बहुत ढूढती थी
बहुत खोजती थी
वो मेरे अपने जो सितारा बनें
भाग्य खेलता है खेल जिंदगी में
जानें क्या लिखा है मेरी हथेली में
बहुत रगडती थी
बहुत पोंछती थी
लकीरें यह कुछ तो दोबारा बनें
आता है सब के जीवन में पल ऐसा
होता है अंत जब उसकी निशा का
बहत झाँकती थी
बहुत तकती थी
कोई नव किरण तो इशारा बने
मंदिर में जाती थी साँझ -सवेरे
रहती हर पल खुदा का द्वार घेरे
बहत पूजती थी
बहुत माँगती थी
कोई पल तो हो जो हमारा बने
कॉपीराइट :वंदना बाजपेयी
(एक पुरानी कविता )
कुछ तो है 


कुछ तो है
बादलों के उस पार
कुछ अस्पष्ट सा 
जो खीचता है मुझे
शायद ?
कृष्ण की बांसुरी
जाना चाहती हूँ तोड़कर
गहरी नीम बेहोशी
झूठ को सच समझने की कवायद
पर हर बार
कुछ स्पष्ट स्वर
भावनाओं का तीव्र बवंडर
घेर लेता है मुझे
और फिर
संवेदनाओं के वेंटिलेटर के सहारे
चलने लगती है जिन्दगी
कुछ अतृप्त सी
कुछ अतृप्त सी ...........
वंदना बाजपेयी
रंग 

हल्दी और चूने का मिलन
बना देता है
रंग केसरिया 
क्या
तथाकथित प्रेम का ?
एक गाँठ में
बंधे दो रंग
लगते है सुन्दर
सह अस्तित्व में
अपनी -अपनी निजता संभाले
न विजय का भाव
न पराजय का भय
रंग दि खता है
ख़ुशी का
अनाधिकार चेष्टा
रंगने को दुसरे को
अपने ही रंग में पूर्णतया
एक छद्म युद्ध
छोड़ देता है
एक ही रंग
धुंधला सा
निराशा का
वंदना बाजपेयी
भूकंप 


                       गूगल से साभार           
अम्मा
सही कहती थी तुम
धरती सी होती है नारी
प्रेम दीवानी सी
काटती रहती है सूर्य के चारों ओर चक्कर
बिना रुके बिना थके
और अपने अक्ष पर थोडा झुककर
नाचती ही रहती है दिन रात
कर्तव्य की धुरी पर
पूरे परिवार को
देने को हवा -पानी ,धूप
सह जाती है असंख्य पदचाप
दे कर अपना रक्त खिलाती है
फूल -फल
हां अम्मा !!!
सही कह रही हो तुम
पर .........
कभी तो विचलित होता होगा मन
चाहती होगी छण भर विश्राम
कुछ हिस्सेदारी सूरज की भी
किरने देने के अतिरिक्त
नियमों ,परम्परों से जरा सी मुक्ति
बांटना चाहती होगी जरा सा दर्द
जरा सी घुटन
भावनाओं का अतिरेक
हां शायद तभी ... तभी
हिल जाती है सूत भर
और दरक जाती है चट्टानें
बिखर जाते हैं .-, वन -उपवन ,नगर के नगर
क्या तभी आते हैं भूकंप ?
बताओ ना ...........
पर यह क्या अम्मा ?
मेरे इस प्रतिप्रश्न पर तुम मौन
आँखों में समेटे
कुछ ........अलिखित सा
शायद !!!
नहीं -नहीं ,अवश्य
तुम भी कर रही हो चेष्टा
कब से
रोकने की एक भूकंप
अन्दर ही अन्दर
वंदना बाजपेयी
थ्योरी ऑफ़ इवोलयूशन 


चारों तरफ पानी ही पानी
पानी में उत्पन्न जीव
जिस पर चढ़ी मोटी सी श्लेष्म की पर्त 
लिजलिजी सी
विकास के क्रम में
यह लिजलिजापन
अन्दर और अन्दर मन की सात परतों में
छिपता गया
जो दिखता है
ऊपरी आवरण हट जाने पर
और पानी ?
कम होते होते
बस आँखों तक सिमटा
फिर आँख का पानी भी मर गया
महज इतनी ही है" थ्योरी ऑफ़ इवोलयूशन "
वंदना बाजपेयी
                         
                              धुंध


                                                       गूगल से साभार 

जब -जब फैलती है
दुखो की चादर
एक धुंध सी दिखती है 
मेरी आँखों के सामने
जिसको दरकिनार कर
हर निस्तब्ध ,ठंडी ,स्याह निशा के बाद
स्वीकार करती हूँ
कर्म की श्रेष्ठता
स्वयं ही कृष्ण स्वयं ही अर्जुन
स्वयं ही स्वयं की उत्प्रेरक
उठा लेती हूँ गांडीव
चढ़ा लेती हूँ प्रत्यंचा
और निकल पड़ती हूँ जीवन संग्राम के मार्ग में
जहाँ धुंध भरी सड़कों पर बहुधा
दिख ही जाते है
स्वेटर पहने स्वान
और ठिठुरते बच्चे
कर्म से प्रारब्ध या प्रारब्ध वश कर्म
पुनः ........
एक धुंध सी छा जाती है
मेरे मन -मष्तिष्क पर
वंदना बाजपेयी
चलो सखी 

                                                         गूगल से साभार 

चलो सखी !
एक बार भूल कर कर
उम्र की पायदाने 
तुम्हारे बालों की सफेदी में छिपे स्याह दर्द
मेरी आखों की झुर्रियों में दफ़न अनगिनत आंसूं
चले वही मोहल्ले के नुक्कड़ की चाट की दुकान पर
जिसके तवे की टनटनाहट खीच ले जाती थी हमें
जोड़ कर अपने दो- चार आने खरीदे वही
आलू की टिकिया का एक दोना
खाए सी -सी करते हुए एक साथ
तुम पहन कर आ जाना वही
सफ़ेद झालर वाली फ्राक
जिसे सीते वक्त
ना जाने कितनी बार छेदी थी
माँ की उंगुलियां
मैं ओढ़ लूँगी माँ का गोटे वाला दुपट्टा
जिसकी उधड गयी थी बखिया
फिर भी इतराती थी
हवा में हिला कर किसी परी की तरह
लौटते समय
हांथों में हाथ दे
हँसेंगे कानफोडू हँसी जोर से
बरसों हो गए जसको सुने हुए
फिर खरीदेंगे काला वाला चूरन
बांटेंगे आधा -आधा
आओगी ना ?
क्या आया जा सकता है
उस अँधेरी सुरंग में आगे बढ़ते हुए
जहाँ बंद हो जाते हैं पीछे के द्वार
छूट जाते हैं वो सावन वो झूले
वो कच्ची मटर की फलियाँ
खाते हुए घूमना
वो आलू की टिकिया
पर देखो बेटी आ रही है
अपनी सखी के साथ
हां ! सखी ये तुम ही तो हो
और ये मैं ही तो हू
डाले हाथों में हाथ ,हँसते खिलखिलाते जोर से
कुछ खाते सी -सी करते हुए
हां ! जी रहीं हूँ मैं तुमको खुद को उसमें
आने का शुक्रिया सखी
हँसी की फसल रुकेगी नहीं
द्वारे की दस्तक मिटेगी नहीं
शायद
यहीं है प्रकाश
अँधेरी सुरंग में
जिसको पकड़ कर बढ़ते जा रहे हैं हम सब
अनवरत
एक दिशा में
वंदना बाजपेयी

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

                                                         हिसाब


                                                 (चित्र गूगल से साभार )

अपनी तीनों पर्स सामने रखकर
मैं लगा रही हूँ हिसाब
कुछ इससे -कुछ उससे 
गुना -भाग जोड़ गणित
ताकि पूरी कर सकू
अपने बेटे के महंगे क्रिकेट बैट की फरमाइश
मेरे पास ही झाड़ू लगाती
शायद मेरे बेटे के वय की
मेरी कामवाली की बिटिया
जो अपने पिता की मृत्यु के पश्चात
आई है एक माह के लिए काम पर
माँ के स्थान पर
लगा रही हैं हिसाब
गुना भाग ,जोड़ गणित
इस आंटी के इतने पैसे उस आंटी के उतने पैसे
उसके असफल गड़ना के प्रयास
और अनेको प्रश्न
बार -बार बाधित कर रहे हैं मेरा हिसाब
मैं चिंतातुर हूँ
अगर हिसाब पूरा न हुआ
तो बेटा रूठ कर भूखा न सो जाए
वो चिंतातुर है
अगर हिसाब पूरा न हुआ
तो पूरा परिवार भूखा न रह जाए
इन सब से इतर
समय लगा रहा है हिसाब
एक ही वय के दो बच्चे
समान कद , मनोभावों
उम्र की गणितीय गड्नाओं के बावजूद
आयु में कितने पृथक हो जाते हैं
एक -दूसरे से
वंदना बाजपेयी