कुछ तो है
कुछ तो है
बादलों के उस पार
कुछ अस्पष्ट सा
जो खीचता है मुझे
शायद ?
कृष्ण की बांसुरी
जाना चाहती हूँ तोड़कर
गहरी नीम बेहोशी
झूठ को सच समझने की कवायद
पर हर बार
कुछ स्पष्ट स्वर
भावनाओं का तीव्र बवंडर
घेर लेता है मुझे
और फिर
संवेदनाओं के वेंटिलेटर के सहारे
चलने लगती है जिन्दगी
कुछ अतृप्त सी
कुछ अतृप्त सी ...........
बादलों के उस पार
कुछ अस्पष्ट सा
जो खीचता है मुझे
शायद ?
कृष्ण की बांसुरी
जाना चाहती हूँ तोड़कर
गहरी नीम बेहोशी
झूठ को सच समझने की कवायद
पर हर बार
कुछ स्पष्ट स्वर
भावनाओं का तीव्र बवंडर
घेर लेता है मुझे
और फिर
संवेदनाओं के वेंटिलेटर के सहारे
चलने लगती है जिन्दगी
कुछ अतृप्त सी
कुछ अतृप्त सी ...........
वंदना बाजपेयी
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