बुधवार, 31 दिसंबर 2014

चाहत 


बहुत सोचती थी
बहुत चाहती थी
कही तो सफ़र में किनारा बने
जाता है जब कोई दूजे जहाँ में
कहतें है रहता है आसमान में
बहुत ढूढती थी
बहुत खोजती थी
वो मेरे अपने जो सितारा बनें
भाग्य खेलता है खेल जिंदगी में
जानें क्या लिखा है मेरी हथेली में
बहुत रगडती थी
बहुत पोंछती थी
लकीरें यह कुछ तो दोबारा बनें
आता है सब के जीवन में पल ऐसा
होता है अंत जब उसकी निशा का
बहत झाँकती थी
बहुत तकती थी
कोई नव किरण तो इशारा बने
मंदिर में जाती थी साँझ -सवेरे
रहती हर पल खुदा का द्वार घेरे
बहत पूजती थी
बहुत माँगती थी
कोई पल तो हो जो हमारा बने
कॉपीराइट :वंदना बाजपेयी
(एक पुरानी कविता )

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