चुड़ैल
घनघोर आश्चर्य
बरसों बाद अब
सब चाहते हैं उसके मन की शांति
आज सब का धयान जा रहा है
उसकी दर्द भरी चीखों पर
इस कदर
पहले भी तो चीखती थी दर्द से कराह कर
तब तो किसी को सुनाई ही नहीं देती
अनसुनी कर देती थी
घर की चारदीवारी
जो सर्वाधिकार सुरक्षित करती थी
लिंग -भेद के
चूल्हे के पास बैठी ,घर की औरतें
दांतों में दबा पल्लू
छिपा लेती थी अपनी जुबान
और ऐठ जाती थी
घर के पुरुषों की मूँछे
आगे बढ़ जाते राह में गुजरते पथिक
कुछ ठिठककर
कुछ ठठा कर
पर जब से बंध गया है
सामने वाले पीपल पर घंट
जलाया जाने लगा है
उसके नाम का दीप संध्या को
और तख़्त पर बैठ गया है
उसका पति एक लोटा थामे
तब से भयग्रस्त घर में
बेचैनी है
बुलाये जा रहे हैं ओझा ,तांत्रिक
तैयारी हो रही है
महाभागवत की
बाँध कर सात गाँठ वाला बांस
हो रहे हैं सारे प्रयास
शांत करने को वो चीखे
जो न जाने क्यों
अब सब को सुनाई पड रहीं हैं
वंदना बाजपेयी

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