वह लेखिका नहीं थी
कवियत्री भी नहीं
उधेड़ते -बुनते स्वेटर पर सधे हाथ
नहीं बुन पाते शब्दों का ताना - बाना
पर महसूस करती थी अक्सर
जैसा अटका है कुछ सीने के बीचों -बीच
जो करता रहता है बेचैन
मुश्किल हो जाता है गटकना निवाला
कभी -कभी बर्तन धोते -धोते
कराह उठती दर्द से
पकड़कर पेडू
चिल्लाती
न पैरो में भारीपन
न खट्टा खाने की इक्षा
फिर कौन है जो जन्म लेना चाहता है
इसी उधेड़बुन में
आँखों से निकलकर
बह जाती
न जाने कितनी उदास सी कवितायें