शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

                                                                        लाल गुलाब 


आज यूं ही प्रेम का
उत्सव मनाते
लोगों में
लाल गुलाबों के
आदान-प्रदान के बीच
मैं गिन रही हूँ
वो हज़ारों अदृश्य
लाल गुलाब
जो तुमने मुझे दिए

तब जब मेरे बीमार पड़ने पर
मुझे आराम करने की
हिदायत देकर
रसोई में आंटे की
लोइयों से जूझते हुए
रोटी जैसा कुछ बनाने की
असफल कोशिश करते हो

तब जब मेरी किसी व्यथा को
दूर ना कर पाने की
विवशता में
अपनी डबडबाई आँखों को
गड़ा देते हो
अखबार के पन्नो में

तब जब तुम
"मेरा-परिवार " और "तुम्हारा-परिवार"
के स्थान पर
हमेशा कहते हो "हमारा-परिवार"

और सबसे ज़यादा
जब तुम झेल जाते हो
मेरी नाराज़गी भी
और मुस्कुरा कर कहते हो
"आज ज़यादा थक गई हैं मेरी मैडम क्यूरी "

नहीं , मुझे कभी नहीं चाहिए
डाली से टूटा लाल गुलाब
क्योंकि मेरा
लाल गुलाब सुरक्षित है
तुम्हारे हिर्दय में
तो ताज़ा होता रहता है
हर धड़कन के साथ।

Vandana Bajpai


रविवार, 9 फ़रवरी 2014

khel

                                                               "दरवाजे "


पहले दरवाजे नहीं खटकते थे
,रिश्ते -नातेदार
मित्र -सम्बन्धी
सीधे
पहुँच जाते थे
रसोई तक
वही जमीन पर पसर
गरम पकौड़ियों के साथ
ढेर सारी बातें
सुख -दुःख का
आदान -प्रदान
फिर खटकने लगे दरवाजे
मेहमान की तरह
रिश्तेदार
बैठाये जाने लगे बैठक में
नरम सोफों पर
कांच के बर्तनों में
परोसी जाने लगी
घर की शान
क्रिस्टल के गिलास में
उड़ेल कर
पिलाई जाने लगी
हैसियत
धीरे -धीरे
बढ़ने लगा स्व का रूप
मेरी जिंदगी मेरी मर्जी
अपना कमरा
अपना मोबाइल ,लैपटॉप
कानों में ठुसे
द्वारपाल
पर कही न कही
स्नेहपेक्षी मन
प्रतीक्षा रत है
किसी अपने का
पर
अब
दरवाजे नहीं खटकते है ..........

वंदना बाजपेई