शुक्रवार, 23 मई 2014

                                            "यह है … या नहीं है "



एक ऊँगली का इशारा 
कुछ अक्षर चिन्हों का योग
और जीवन के विस्तृत कैनवास पर
अस्तित्व में आ जाता है एक संसार
या एक समूची सृष्टि
जो है भी , और नहीं भी है
जहां है बहुत सारे  लोग
फूल पत्ती ,झरने ,गिरी कंदराएँ
जहाँ नहीं है दीवारें
राजाओं की ,रियासतों की
देशों की धर्म की
आह !क्या यह स्वर्ग है
तभी अचानक
अमूर्त का मूर्त रूप ले
बोलने लगती है
मानवीय आकृतियाँ
गीत गाने लगते है
फूल- पत्ती, झरने
शुरू  हो जाता है कलरव
लग जाती है हाट
तय होने लगती है
 सामानों की कीमत
कुछ खास नियमों के द्वारा
बढ़ने लगता है अहंकार
या टूटने लगती है हिम्मत
इन सब के मध्य
कही बढ़ रहा है अनुराग
फूटने लगी है
रिश्तों की कोपलें
और कही विवाद
डसने लगते है
ईर्ष्या -क्रोध के सर्प
तैयार हो जाते है योद्धा
खिचती है तलवारें
भयाक्रांत होने लगता है मन
 टूटते -बनते रिश्तों से
क्रोध और नफरत के स्फुलिंगों से
.
तभी अचानक
एक उंगली के इशारे पर
विलीन हो जाती है
सारी  सृष्टि
जो थी भी और नहीं भी थी
और मैं लौट आती हूँ
उस सृष्टि में
जो है ……  या
शायद …नहीं है
क्योँकी
"बहम सत्य और जगत मिथ्या "
के सिद्धांत पर चलने वाली
यह समूची सृष्टि
कही ईश्वर द्वारा
मात्र
एक उंगली के इशारे पर
चलायी जाने वाली
fb ही तो नहीं है




रविवार, 18 मई 2014

                                                     "  बस !दो मिनट "



अक्सर 
टीवी ,विज्ञापनों वाली
कलफ लगी साडी में
बस !दो मिनट ,कहकर
मुस्कुराती हुई
मम्मी को देखकर
निराशा और कुंठा से
भर जाती है
एक शिक्षित ,कामकाजी
भारतीय नारी
सुबह से शाम तक
घर -कार्यक्षेत्र में
"वृहद पहिये" की
धुरी की तरह
हर अक्ष पर
सैकड़ों जिम्मेदारियों को साधती
गृहस्थी की चक्की में
तिल -तिल कर
कूट ती पिसती
होती रहती है
सबकी  शिकायतों की शिकार
करती  क्या रहती हो
दो मिनट नहीं निकाल पाती  हो
शायद
 यह दो मिनट
उसकी जिंदगी के कैनवास से
सर्फ एक्सेल से धुले दाग की तरह
ऐसे उड़ जाते है
कितना भी
एड़ी -चोटी का जोर लगाती है
पर ताउम्र
ढूंढती रह जाती है