रविवार, 18 मई 2014

                                                     "  बस !दो मिनट "



अक्सर 
टीवी ,विज्ञापनों वाली
कलफ लगी साडी में
बस !दो मिनट ,कहकर
मुस्कुराती हुई
मम्मी को देखकर
निराशा और कुंठा से
भर जाती है
एक शिक्षित ,कामकाजी
भारतीय नारी
सुबह से शाम तक
घर -कार्यक्षेत्र में
"वृहद पहिये" की
धुरी की तरह
हर अक्ष पर
सैकड़ों जिम्मेदारियों को साधती
गृहस्थी की चक्की में
तिल -तिल कर
कूट ती पिसती
होती रहती है
सबकी  शिकायतों की शिकार
करती  क्या रहती हो
दो मिनट नहीं निकाल पाती  हो
शायद
 यह दो मिनट
उसकी जिंदगी के कैनवास से
सर्फ एक्सेल से धुले दाग की तरह
ऐसे उड़ जाते है
कितना भी
एड़ी -चोटी का जोर लगाती है
पर ताउम्र
ढूंढती रह जाती है 

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