माफ़ कीजिएगा
ये आम रास्ता नहीं है
माना की सिरों पर चपटी है, ये गोल धरती
पर उस बित्ते भर जगह पर
पहुँचने से पहले
फैला है भावनाओं का पूरा मकड़जाल
आशा- निराशा के दवंद
अज्ञान तिमिर के फंद
कि हर इंसान भाग रहा है उसकी तरफ़
जो भाग रहा है किसी दूसरे की ओर
वो दूसरा किसी तीसरे की ओर
क्योंकि जो खुद आ रहा है पास
वो नहीं लगता कभी खास
और जो मिल गया कभी खास
तो अंगुली के पोरों में उतर आता है
मैडास से उल्टा श्राप
और आम सा लगने लगता है उस खास का एहसास
धप-धप, धप -धप धम-धम, धम-धम
ये कोलाहल, ये क्रंदन
नियति है या निर्मिति
जो भी हो ये आम रास्ता नहीं है
माफ़ कीजिएगा
वंदना बाजपेयी
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