शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

जब मैं तुम्हें याद करती हूँ


 

सोचती हूँ जब मैं तुम्हें याद करती हूँ,

तुम्हें आती होंगी हिचकियाँ

या बेखयाली में पलटते हुए अखबार

अटक-अटक जाती होगी निगाह

मेरे नाम से मिलते-जुलते हर नाम पर

निपटाते हुए जरूरी, गैर जरूरी कामों को

कानों में सरगम से गुनगुनाते होंगे मेरे शब्द

या खुल जाती होगी नींद

आधी रात को अचानक से

हो जाती होगी कमीज पसीने से तर-बतर

और बुदबुदाते होगे तुम

“ओह, शुक्र है ये बस सपना था”

सुना है ऐसा होता है प्रेम में

पर पूछा नहीं है कभी तुमसे

बस मान लिया है

और बस मान लेने से 

 मेरा दिन हो जाता है खुशगवार

वंदना बाजपेयी