शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

उन्मुक्त उड़ान






उन्मुक्त उड़ान
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अक्सर देखती हूँ
हर शाम 
पंक्षी अपने पर फैलाए
जल्दी से जल्दी लौट जाना चाहते हैं
अपने घोसलों की ओर
उपजता है
एक स्वाभाविक प्रश्न
आखिर क्या है
कि उड़ने को पर
और सामने विस्तृत आकाश होते हुए भी
उन्मुक्त उड़ानों पर
विराम लगाते हुए
लौट आते हैं
संकुचित से घोसलों में
शायद वो जानते हैं कि
उन्मुक्त उड़ानों से जीवन नहीं चलता
बंधन जरूरी हैं
जड़ों के
बंधन जरूरी हैं
घरों के
बंधन जरूरी हैं
स्नेह के
शायद वो जानते हैं कि
स्वतंत्रता और बंधन में
जरूरी है एक संतुलन
सिर्फ बंधनों से
अटकता है जीवन
पर बिना किसी बंधन के
भटकता है जीवन
वंदना बाजपेयी

घर वापसी







रोटी की तलाश में घर से दूर गए लोग
हर रोज देते हैं दिलासा खुद को
बस कुछ समय और
कि एक दिन लौट जायेंगे घर की ओर
गाते हुए राग मल्हार 
जैसे लौट आते है पखेरू
अपने घोंसलों में मीलों उड़ने के बाद
.
.
.
पर घर वापस आना
सदा घर वापस आना नहीं होता...........
कभी-कभी समय की चाक पर पक कर
रिश्ते ले चुके होते है
कोई दूसरा आकार
या उम्र के साथ हो जाता है दृष्टि भ्रम
दूर से जो नज़र आते थे पास
अब पास से नज़र आते हैं दूर
कभी- कभी टूट चुका होता है
खुद काही कोई कोना
चटके दरके कई टुकड़ों में
कहाँ आ पाते हैं साबुत
..
.
या कभी -कभी जिनकी तलाश में
आते हैं लौटकर
ढूढ़ते हैं जिन्हें बदहवास
वो लोरियां छुप गयी होती हैं
फ्रेम में जड़ी तस्वीर पर चढ़ी माला में
या दिन -रात खटकती हुई लाठी
मात्र रह जाती है टंग कर अलगनी पर
अनछुई सी
जब भी घर से बाहर निकलों
येसोच लेना
कि घर वापस आना
सदा घर वापास आना नही होता...........
वंदना बाजपेयी