उन्मुक्त उड़ान
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अक्सर देखती हूँ
हर शाम
पंक्षी अपने पर फैलाए
जल्दी से जल्दी लौट जाना चाहते हैं
अपने घोसलों की ओर
उपजता है
एक स्वाभाविक प्रश्न
आखिर क्या है
कि उड़ने को पर
और सामने विस्तृत आकाश होते हुए भी
उन्मुक्त उड़ानों पर
विराम लगाते हुए
लौट आते हैं
संकुचित से घोसलों में
शायद वो जानते हैं कि
उन्मुक्त उड़ानों से जीवन नहीं चलता
बंधन जरूरी हैं
जड़ों के
बंधन जरूरी हैं
घरों के
बंधन जरूरी हैं
स्नेह के
शायद वो जानते हैं कि
स्वतंत्रता और बंधन में
जरूरी है एक संतुलन
सिर्फ बंधनों से
अटकता है जीवन
पर बिना किसी बंधन के
भटकता है जीवन
हर शाम
पंक्षी अपने पर फैलाए
जल्दी से जल्दी लौट जाना चाहते हैं
अपने घोसलों की ओर
उपजता है
एक स्वाभाविक प्रश्न
आखिर क्या है
कि उड़ने को पर
और सामने विस्तृत आकाश होते हुए भी
उन्मुक्त उड़ानों पर
विराम लगाते हुए
लौट आते हैं
संकुचित से घोसलों में
शायद वो जानते हैं कि
उन्मुक्त उड़ानों से जीवन नहीं चलता
बंधन जरूरी हैं
जड़ों के
बंधन जरूरी हैं
घरों के
बंधन जरूरी हैं
स्नेह के
शायद वो जानते हैं कि
स्वतंत्रता और बंधन में
जरूरी है एक संतुलन
सिर्फ बंधनों से
अटकता है जीवन
पर बिना किसी बंधन के
भटकता है जीवन
वंदना बाजपेयी
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