वंदना बाजपेयी
रविवार, 13 दिसंबर 2015
समय कि चादर
सरसरा कर फिसल जातें हैं
हथेली से रेत के मानिंद
कुछ
खूबसूरत पल
चाह कर भी
समय कि चादर पर
कशीदाकारी
नहीं होती
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