गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

मैं नदिया तुम सागर विशाल








ये प्रेम बहुत अदभुत कमाल 
मैं नदिया तुम सागर विशाल 

देखा ऊंचाई से तुमको
तुम लगे बहुत शांत निश्छल
प्रेमांकुर मन में पनप उठे
पाने को तुमको मैं विह्वल

निकली चुपके से खोल द्वार
रोका  बाबुल ने मुझे पुकार
पर मैं थी कहाँ रुकने वाली
झटपट झटपट चलने वाली


कितनी मिटटी को काट काट
कितने घाटों को पाट  -पाट
आलिंगन करने को तुमसे
मैं चल दी छोड़ कर राजपाट

तुमसे मिलकर ही जान सकी
की मैं थी  तुमसे अनजान अभी
जिसको समझी थी मैं निश्छल
तुम तो आशिक निकले चंचल

ना जाने कितनी नदियों का जल
तुमने अपने में समेटा है
यह प्रेम नहीं  है ,  धोखा है
आह ! ये प्रेम नहीं है धोखा है........... 

जा सकती अब मैं लौट नहीं
अब मेरा कोई अस्तित्व नहीं
मैं प्रेम में  पिघली पानी बन 
पानी-पानी हो अतृप्त रही 

इससे भी ज्यादा है एक दुःख
जिसने जीते जी मुझको मारा है
जो मैं थी मीठी मिश्री सी
कर किया मुझे  क्यों खारा है

ये लहर लहर जो उठती  तुममें
करते जिसमे सब क्रीडा हैं
कोई ना इसको समझ सके
यह हम नदियों की पीड़ा है

यूँ उफन उफन  कहते सबसे
ये प्रेम एक फंदा होता है
सुनता है लेकिन कौन इसे
ये प्रेम ही अँधा होता है ……….

ये प्रेम ही अँधा होता है ……….

वंदना बाजपेयी 

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