ये प्रेम बहुत अदभुत कमाल
मैं नदिया तुम सागर विशाल
देखा ऊंचाई से तुमको
तुम लगे बहुत शांत निश्छल
प्रेमांकुर मन में पनप उठे
पाने को तुमको मैं विह्वल
निकली चुपके से खोल द्वार
रोका बाबुल ने मुझे पुकार
पर मैं थी कहाँ रुकने वाली
झटपट झटपट चलने वाली
कितनी मिटटी को काट काट
कितने घाटों को पाट -पाट
आलिंगन करने को तुमसे
मैं चल दी छोड़ कर राजपाट
तुमसे मिलकर ही जान सकी
की मैं थी तुमसे अनजान अभी
जिसको समझी थी मैं निश्छल
तुम तो आशिक निकले चंचल
ना जाने कितनी नदियों का जल
तुमने अपने में समेटा है
यह प्रेम नहीं है , धोखा है
आह ! ये प्रेम नहीं है धोखा है...........
जा सकती अब मैं लौट नहीं
अब मेरा कोई अस्तित्व नहीं
मैं प्रेम में पिघली पानी बन
पानी-पानी हो अतृप्त रही
इससे भी ज्यादा है एक दुःख
जिसने जीते जी मुझको मारा है
जो मैं थी मीठी मिश्री सी
कर किया मुझे क्यों खारा है
ये लहर लहर जो उठती तुममें
करते जिसमे सब क्रीडा हैं
कोई ना इसको समझ सके
यह हम नदियों की पीड़ा है
यूँ उफन उफन कहते सबसे
ये प्रेम एक फंदा होता है
सुनता है लेकिन कौन इसे
ये प्रेम ही अँधा होता है ……….
ये प्रेम ही अँधा होता है ……….
वंदना बाजपेयी

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