शनिवार, 7 दिसंबर 2013

Bojh

                                                                  बोझ 

पार्क में अक्सर 
देखती हूँ
हमारे घर  की
कामवालियाँ     
बैठ जाती है
झुरमुट बनाकर
सुनाने लगती है 
किस्से 
शराब पी कर आये 
पति द्वारा पिटाई  के
पति की  बेवफाई के 
बच्चों के दर्द 
आटे दाल का भाव 
और आँसू पोंछ कर 
चली जाती है 
हलकी होकर 


और हम बड़े लोग 
अधरो पर बनावटी 
मुस्कान चिपकाये 
कई दर्द दिल में  दबाये 
झूठी शान का  टनो बोझ 
सर पर लिए 
पार्क में 
चक्कर पर चक्कर 
लगाते रहते है 
वजन 
घटाने के लिए 
vandana bajpai
(7.12.13) 
  

  


शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

gulaab aur kanta

                                                                 ''गुलाब और काँटा ''
जब एक डाली पर जनम हुआ
संग -संग ही अपना गात बना
तब अपने मध्य यह अंतर क्यूँ ?
तुम हो गुलाब मैं कंटक क्यूँ?

तुम रूप रस ,गुण गंध युक्त
पूजन -अर्चन श्रृंगार में नियुक्त
कवि कल्पना का  प्रथम द्वार
मिलता सबसे अतिशय प्यार

मैं हतभागा सा खड़ा हुआ
 आत्मग्लानि से गड़ा हुआ
उलाहने मिलते मुझको अनेक
मैं कब तक विष पियुंगा यूँ

सुनो मुझसे मत द्वेष करो
अपने मन में मत क्लेश करो
अपने घर में  कहाँ रह पाता
निज डाली से टूटता है नाता

जो देखता है वो ललचाता
तोडा कुचला मसला जाता
कैसे समझाउ मैं तुमको
यह रूप बना है  बाधक यूँ
vandana bajpai
(6.12 13)          

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

astitv ka vish

                                                                 अस्तित्व  का विष
हतप्रभ  हो तुम 
स्वपनो केपंख
सहयोग
उडने को आकाश
क्या कुछ नहीं है
आज की नारी के पास
पर फिर क्यो है
आक्रोश से भरी ,हताश ?
हाँ ,हम हैं
क्योकि हमारे पर
क्षितिज में जितना
विस्तार पाते हैं
धरा -गगन के दृश्
जितने साफ़
नजर आते हैं


उतना ही भर जाता है
आक्रोश
आह !
कितन मुर्ख बनाया गया  हमें
सदिया बीत गयी
पुरुष निर्मित
औरत की परिभाषा को जीते -जीते
और बंद तहखाने में
अस्तित्व का विष पीते -पीते    
 vandana bajpai 

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

Aanchal

                                                                    आँचल 
अक्सर 
उलट -पलट
कर
देखती हूँ
अपना आँचल
जिसके
सर पर आते ही
मुझे हो जाता है
कर्तव्य बोध
याद आ जाती है
अनगिनत जिम्मेदारियाँ
और बदल जाती है
मेरी चाल
सोंच,
दृष्टिकोण
यहाँ तक कि
मेरा संपूर्ण
व्यक्तित्व।
 
-vandana bajpai 

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

Vasudhaiv Kutumbkam

                                                                  वसुधैव कुटुंबकम 
 पापा
आपके जाने के बाद
रो कर ,तड़प कर
चीख-चिल्लाकर
कितना किया याद

हर पल में आपकी
अनुपस्थिति नज़र आती
ज़िन्दगी अजीब
निराशा से भर जाती

फिर अपने आँसू पोंछ
देखा चारों ओर
अरे! आस-पास
अगल-बगल
ये आप ही तो हैं

ये आप ही तो हैं
जो अपने अनगिनत
झुर्रीदार हाथों से
फेर देते हैं
मेरे सिर पर हाथ

ये आप ही तो हैं
जो अनगिनत रूप धरे
लाठी टेकते हुए
आ जाते हैं मेरे घर
मार्गदर्शन देने के लिए

ये आप ही तो है
जो असंख्य सलवट पड़ी
आँखों से देखते है
खुश हो कर
मेरा प्यारा घर

अब जब दुःख से
निकल पाई हूँ
तब जान पाई हूँ
क्यों कराते थे
ऋषि-मुनि बार-बार याद
"वसुधैव कुटुंबकम" का पाठ 

-Vandana Bajpai
(3.12.2013)

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

Vidhwans

                                                                           विध्वंस 


फिर आज कुछ गलत हो गया
कुछ शब्द
पकने से पूर्व
वाक्यों में गढ़ने से पूर्व
यूं ही टूटे-फूटे
अचानक
निकल गए
मुँह की देहरी लांघ कर
जो कहना चाहते थे
अंतर्मन की
कुछ अकथ
कथाओं को
परन्तु समुचित
आकार के अभाव में
अचानक सहस्त्रगुणा हो
तीव्र गति से
कानों से घुस कर
पहुँच गए
मन सत्ता का
विध्वंस करने…

-Vandana Bajpai

रविवार, 1 दिसंबर 2013

Ye ghar pyara bahot hai...

                                                                  ये घर प्यारा बहुत है 

तुम्हारे महल ऊँचे
मेरा छोटा घरौंदा
मगर फिर भी हमें
ये घर प्यारा बहुत है।

यहाँ नीवों में मेरी
मधुर यादें गड़ी हैं
जो कीमत आंक पाये
तराज़ू कहाँ बनी है ?
अँधेरा जो हरता
एक सितारा बहुत है

वो बाबूजी कि लाठी
वो माँ का टूटा चश्मा
वो अधखाई दवाई पर
इबारत अधलिखी सी,
वो पीले ख़त कि खुशबू
का सहारा बहुत है।

भावनाओं कि ईंटों से
ये दीवारें तनी हैं
हवा को तर जो रखती
वफ़ा की वो नमी है
लकीरें "हम-तुम" की तोड़े
वो "हमारा" बहुत है।

वो बच्चों की तोतली
बातों का खज़ाना
वो अपनी प्यारी बिटिया
का लाल फीता पुराना
उम्र भर देखने को
ये नज़ारा बहुत है।

-Vandana Bajpai