अस्तित्व का विष
हतप्रभ हो तुम
स्वपनो केपंख
सहयोग
उडने को आकाश
क्या कुछ नहीं है
आज की नारी के पास
पर फिर क्यो है
आक्रोश से भरी ,हताश ?
हाँ ,हम हैं
क्योकि हमारे पर
क्षितिज में जितना
विस्तार पाते हैं
धरा -गगन के दृश्
जितने साफ़
नजर आते हैं
उतना ही भर जाता है
आक्रोश
आह !
कितन मुर्ख बनाया गया हमें
सदिया बीत गयी
पुरुष निर्मित
औरत की परिभाषा को जीते -जीते
और बंद तहखाने में
अस्तित्व का विष पीते -पीते
vandana bajpai
हतप्रभ हो तुम
स्वपनो केपंख
सहयोग
उडने को आकाश
क्या कुछ नहीं है
आज की नारी के पास
पर फिर क्यो है
आक्रोश से भरी ,हताश ?
हाँ ,हम हैं
क्योकि हमारे पर
क्षितिज में जितना
विस्तार पाते हैं
धरा -गगन के दृश्
जितने साफ़
नजर आते हैं
उतना ही भर जाता है
आक्रोश
आह !
कितन मुर्ख बनाया गया हमें
सदिया बीत गयी
पुरुष निर्मित
औरत की परिभाषा को जीते -जीते
और बंद तहखाने में
अस्तित्व का विष पीते -पीते
vandana bajpai
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