गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

astitv ka vish

                                                                 अस्तित्व  का विष
हतप्रभ  हो तुम 
स्वपनो केपंख
सहयोग
उडने को आकाश
क्या कुछ नहीं है
आज की नारी के पास
पर फिर क्यो है
आक्रोश से भरी ,हताश ?
हाँ ,हम हैं
क्योकि हमारे पर
क्षितिज में जितना
विस्तार पाते हैं
धरा -गगन के दृश्
जितने साफ़
नजर आते हैं


उतना ही भर जाता है
आक्रोश
आह !
कितन मुर्ख बनाया गया  हमें
सदिया बीत गयी
पुरुष निर्मित
औरत की परिभाषा को जीते -जीते
और बंद तहखाने में
अस्तित्व का विष पीते -पीते    
 vandana bajpai 

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