शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

gulaab aur kanta

                                                                 ''गुलाब और काँटा ''
जब एक डाली पर जनम हुआ
संग -संग ही अपना गात बना
तब अपने मध्य यह अंतर क्यूँ ?
तुम हो गुलाब मैं कंटक क्यूँ?

तुम रूप रस ,गुण गंध युक्त
पूजन -अर्चन श्रृंगार में नियुक्त
कवि कल्पना का  प्रथम द्वार
मिलता सबसे अतिशय प्यार

मैं हतभागा सा खड़ा हुआ
 आत्मग्लानि से गड़ा हुआ
उलाहने मिलते मुझको अनेक
मैं कब तक विष पियुंगा यूँ

सुनो मुझसे मत द्वेष करो
अपने मन में मत क्लेश करो
अपने घर में  कहाँ रह पाता
निज डाली से टूटता है नाता

जो देखता है वो ललचाता
तोडा कुचला मसला जाता
कैसे समझाउ मैं तुमको
यह रूप बना है  बाधक यूँ
vandana bajpai
(6.12 13)          

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