शनिवार, 19 जुलाई 2014

                                                          !!!!!!!!!गुरुमहिमा !!!!!!!!!



अनगढ़ माटी सा था 
मेरा अस्तित्व
अज्ञान के अंधकार में लीन
निज पहचान से हीन
गुरु ने ही डाले थे
मेरे अंदर ज्ञान के बीज
ब्रह्मा की तरह
अपने स्नेह व् वात्सल्य से प्रतिदिन सींचा था
गहरे तक मन की जड़ों को
विष्णु की तरह
तभी तो धीरे -धीरे
बढ़ा था ज्ञान का पौधा
धरती फाड़ कर
मिचमिचाते हुए
खोली थी
अपनी उनींदी आँखें
और पहली बार सामना किया था
 सूर्य के प्रकाश का
अपने दृढ -संकल्प के साथ
और तब साध लिया था  सतर्क गुरु ने
 नित कटी थी मेरी
विकार रुपी डालियाँ
और रोक दिया था  गलत दिशा में बढ़ने से
महेश की तरह
हाँ
अब जानी हूँ
गुरु ही है त्रिदेव
साक्षात ब्रह्मा ,विष्णु और महेश
जो जीवन की" दशा और दिशा" तय करते है   
                                                         !!!!!!!!!!!काश !!!!!!!!!!!


देखों तो!!!!

जैसे ही
सावन की बूंदों ने
मेघ- मल्हार गाना शुरू किया
यह सारे तरुवर
हर्षित हो , पत्तियां हिला हिला कर
 करने लगे हैं नर्तन 
अब इन्हे कहाँ है स्मरण
कि आँसू सूख जाने की सीमा तक
रुलाया था
जेठ की
झुलसती दोपहर के
अत्याचार ने
कि बिना किसी स्नेहिल अलाव के
अकेले ही काटी थी
हांड तक कँपा देने वाली
पूस की निस्तब्ध वीरान स्याह रातें
काश !!!
हम भी यूँ ही
अपने अतीत की परछाईयों तले
अपना वर्तमान ना खोते

सोमवार, 14 जुलाई 2014

                                        !!!!!!!!!!!!! अंतर !!!!!!!!!!!!!!!!!

बचपन में मुझे मिली थी 
गुड़ियाँ 
सुन्दर
नीली आँखों वाली
तुम्हे मिली थी बन्दूक
काली
डरावनी ,खौफनाक

मैं मिन्नते  करती
श श श। …
धीरे बोलो
गुड़ियाँ जाग जाएगी
तुम कहते
आवाज़ निकली तो
 ठोंक  दी जाएगी

मैं मिट्टी के बर्तन में
धीरे -धीरे
बनाती थी खाना
तुम्हे भाता था
घोड़े पर सवार
कड़बक -कड़बक
फसल रौंदते आना

मैंने सीखा
कलेजे से लगा गुड़ियां को सुलाना
तुमने सीखा
हुकूमत चलाना
हम बड़े हुए
खिलौने छुटे
दुर्भाग्य
हमारे -तुम्हारे बीच
यह अंतर
बना रहा  
                                   !!!!!!!!!!!!!!!!!वजूद की तलाश !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


हाँ !!!
मुझे अब भी स्वीकार है
आँगन की तुलसी पर
सौभाग्य की लाल चुनरी बांधना।

हाँ !!!
मुझे अब भी स्वीकार है
पूजागृह  के दीपक में
चुपचाप  घृत बनकर जलना।

हाँ !!!
मुझे अब भी स्वीकार है
अपने त्याग के रंगों से
द्वार की अल्पना को सजाना।

हाँ !!!
मुझे अब भी स्वीकार है
बेले और मोगरे की खुशबू से
गृह -मंदिर  को महकाना

पर नहीं !!!
स्वीकार नहीं अब मुझको
तुम्हारी नजरों से अपना आकलन
न यह क्रोध  है न बदला  
बस !!!
तमाम पूर्वाग्रहों , बेड़ियों
धारणाओं
पर निर्मित आइनों को हटाकर
देखना चाहती हूँ
खुद को
खुद की नज़र से
देना चाहती हूँ
अपनी अभिव्यक्ति को स्वर
चलना चाहती हूँ
अपने ही पैरों से
क्योंकि यह है !!!
मेरे वजूद की तलाश