शनिवार, 19 जुलाई 2014

                                                         !!!!!!!!!!!काश !!!!!!!!!!!


देखों तो!!!!

जैसे ही
सावन की बूंदों ने
मेघ- मल्हार गाना शुरू किया
यह सारे तरुवर
हर्षित हो , पत्तियां हिला हिला कर
 करने लगे हैं नर्तन 
अब इन्हे कहाँ है स्मरण
कि आँसू सूख जाने की सीमा तक
रुलाया था
जेठ की
झुलसती दोपहर के
अत्याचार ने
कि बिना किसी स्नेहिल अलाव के
अकेले ही काटी थी
हांड तक कँपा देने वाली
पूस की निस्तब्ध वीरान स्याह रातें
काश !!!
हम भी यूँ ही
अपने अतीत की परछाईयों तले
अपना वर्तमान ना खोते

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