सोमवार, 14 जुलाई 2014

                                   !!!!!!!!!!!!!!!!!वजूद की तलाश !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


हाँ !!!
मुझे अब भी स्वीकार है
आँगन की तुलसी पर
सौभाग्य की लाल चुनरी बांधना।

हाँ !!!
मुझे अब भी स्वीकार है
पूजागृह  के दीपक में
चुपचाप  घृत बनकर जलना।

हाँ !!!
मुझे अब भी स्वीकार है
अपने त्याग के रंगों से
द्वार की अल्पना को सजाना।

हाँ !!!
मुझे अब भी स्वीकार है
बेले और मोगरे की खुशबू से
गृह -मंदिर  को महकाना

पर नहीं !!!
स्वीकार नहीं अब मुझको
तुम्हारी नजरों से अपना आकलन
न यह क्रोध  है न बदला  
बस !!!
तमाम पूर्वाग्रहों , बेड़ियों
धारणाओं
पर निर्मित आइनों को हटाकर
देखना चाहती हूँ
खुद को
खुद की नज़र से
देना चाहती हूँ
अपनी अभिव्यक्ति को स्वर
चलना चाहती हूँ
अपने ही पैरों से
क्योंकि यह है !!!
मेरे वजूद की तलाश




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